प्री लोकमंथन-2026 में लोक साहित्य पर विमर्श, डॉ. मीनाक्षी मीनल को मिला सम्मान
- Post By Admin on Oct 05 2026
मुजफ्फरपुर: सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन की बैठक सोमवार को मालीघाट, मुजफ्फरपुर में आयोजित की गई। संस्थान की संरक्षक एवं वरिष्ठ कठपुतली कलाकार कांता देवी की अध्यक्षता में हुई बैठक में लोक साहित्य और लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई।
बैठक में जानकारी दी गई कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास के तत्वावधान में प्री लोकमंथन-2026 ‘हम भारत के लोग’ का आयोजन चंपारण की धरती पर होटल रैमसन प्लाजा, बरियारपुर, मोतिहारी में किया गया। आयोजन पूरी तरह लोक साहित्य पर केंद्रित रहा, जिसमें साहित्यकारों, लोक कलाकारों और साहित्यप्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित हुआ। प्रथम सत्र में लोक साहित्य पर बौद्धिक विमर्श किया गया, जबकि दूसरे सत्र में लोक काव्य एवं लोकगीत की प्रस्तुतियां हुईं। दोनों सत्रों की अध्यक्षता प्रो. अरुण कुमार ने की और मंच संचालन डॉ. विकास कुमार ने किया।
लोक संस्कृति से जुड़े इस आयोजन में लोकगायिका अनीता कुमारी ने पारंपरिक देवी गीत, सामा-चकेवा, बारहमासा और भिखारी ठाकुर के गीतों की प्रस्तुति दी। वहीं संस्थान के निदेशक एवं कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने गंगा गीत, झूमर, पमरिया गीत, खिलौना गीत और कठपुतली गीत प्रस्तुत किए। उन्होंने चर्चित ‘लीचिया लाले’ की भी विशेष प्रस्तुति दी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। कार्यक्रम में प्रो. अरुण कुमार, डॉ. दिवाकर राय, सुशील कुमार, वाल्मीकि कुमार प्रखर, डॉ. गोविंद प्रसाद वर्मा, गुलरेज शहजाद और डॉ. विनय कुमार सिंह सहित कई साहित्यकारों एवं विशेषज्ञों ने लोक साहित्य की विविधता और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने लोक साहित्य को भारतीय संस्कृति और सामाजिक स्मृति का महत्वपूर्ण आधार बताया।
इस अवसर पर डॉ. सुनील कुमार, विनय कुमार बिन्नू, विवेक सिंह, राजगुरु, धनंजय उदय, रूपेश कुमार, शिवम कुमार सिंह, गौतम कुमार और सोनी कुमारी सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के समापन पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद की केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य (लोक साहित्य) एवं संयोजक डॉ. मीनाक्षी मीनल को लोक साहित्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने उन्हें ‘लीचिया लाले’ पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया। इस सम्मान को लोक साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के प्रति सम्मान और लोक परंपराओं को आगे बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा गया।