संपादकीय समाचार

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संपादकीय: भूखी उम्मीदों पर टिकी सरकार, 16 रुपये के खाते में लोकतंत्र की असली तस्वीर
  • Post by Admin on Jun 19 2026

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि सत्ता जनता के लिए होती है। सरकारें इस भरोसे पर बनती हैं कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और सम्मान पहुंचाएंगी। लेकिन जब एक बुजुर्ग दादी अपनी वृद्धावस्था पेंशन की उम्मीद में हर महीने बैंक का चक्कर लगाती हैं और उनके खाते में केवल 16 रुपये पड़े होते हैं, तब सवाल केवल एक पेंशन का नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था की संवेदनहीनता का आ   read more

संपादकीय: न्यायालय का न्याय या एनकाउंटर? बिहार किस दिशा में बढ़ रहा है ?
  • Post by Admin on Jun 18 2026

भोजपुर के भरत तिवारी की मौत केवल एक पुलिस मुठभेड़ का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसके केंद्र में कानून का शासन और न्यायपालिका की सर्वोच्चता है। सवाल केवल इतना नहीं है कि भरत तिवारी अपराधी था या नहीं। असली सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपराधी भी हो, तो क्या उसकी सजा का फैसला पुलिस करेगी ? भरत तिवारी का एक वीडियो वायरल होता है। उसके बाद पुलिस   read more

संपादकीय: मौत, राजनीति और धर्म का कार्ड
  • Post by Admin on Jun 15 2026

किसी भी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोना सबसे बड़ी त्रासदी होती है। ऐसे समय में समाज यह अपेक्षा करता है कि शोक, संवेदना और सत्य की खोज सबसे ऊपर रहे। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे सार्वजनिक जीवन में कई बार दुखद घटनाएं भी राजनीतिक और वैचारिक हथियार में बदल जाती हैं। हालिया घटनाक्रम इसी चिंता को सामने लाता है। रौशन आनंद और खान सर के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिस्पर्धा और मतभ   read more

संपादकीय: गड्ढों का स्वर्णिम युग और गन्ने के रस की महान गाथा
  • Post by Admin on Jun 13 2026

माननीय मंत्री महोदय, आपको साधुवाद! देश में विकास की जो नई परिभाषा आपने गढ़ी है, वह अद्भुत है। पहले लोग सड़क पर गाड़ी चलाते थे, अब गड्ढों के बीच सड़क खोजते हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों की हालत देखकर लगता है कि टोल टैक्स सड़क निर्माण के लिए नहीं, बल्कि गड्ढों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वसूला जा रहा है। कहीं-कहीं तो गड्ढे इतने आत्मनिर्भर हो चुके हैं कि सड़क उन पर आश्रित दिखाई देती है   read more