मुजफ्फरपुर में 15 करोड़ की जमीन का विवाद, निलंबित मुशहरी सीओ गिरफ्तार

  • Post By Admin on Oct 09 2026
मुजफ्फरपुर में 15 करोड़ की जमीन का विवाद, निलंबित मुशहरी सीओ गिरफ्तार

मुजफ्फरपुर : बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जमीन के दस्तावेजों में कथित हेराफेरी के मामले में पुलिस ने मुशहरी के निलंबित अंचलाधिकारी महेंद्र प्रसाद शुक्ला को गिरफ्तार किया है। मामला अहियापुर थाना क्षेत्र की करीब 70 डिसमिल जमीन से जुड़ा है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 15 करोड़ रुपए बताई जा रही है। पुलिस के अनुसार, जमीन के स्वामित्व और हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच के दौरान तत्कालीन अंचलाधिकारी की भूमिका भी सामने आई थी। उनसे कई घंटे तक पूछताछ की गई, जिसके बाद गिरफ्तारी की गई। मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कांतेश कुमार मिश्रा ने गिरफ्तारी की पुष्टि की है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गिरफ्तारी से दो दिन पहले ही राजस्व विभाग ने विभागीय जांच और जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर महेंद्र प्रसाद शुक्ला को निलंबित किया था। अब पुलिस जमीन के कथित फर्जी हस्तांतरण, राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव और इस प्रक्रिया से लाभ उठाने वाले लोगों की भूमिका की पड़ताल कर रही है। जांच के केंद्र में अहियापुर क्षेत्र की वह जमीन है, जिसके वास्तविक स्वामित्व को लेकर विवाद सामने आया। शिकायतकर्ता सेवानिवृत्त अवर सचिव विजय कुमार शाही ने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी और सहमति के बिना जमीन के दस्तावेज तैयार कर उसका हस्तांतरण दूसरे लोगों के नाम किया गया। शिकायत के अनुसार, करीब 70 डिसमिल जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पहले एक व्यक्ति के नाम दर्ज कराया गया और बाद में उसी जमीन के हस्तांतरण से संबंधित एक और दस्तावेज सामने आया।

इस जमीन को लेकर कृष्णनंदन पासवान और विधायक अमित कुमार रानू के भाई अभिनव उर्फ सोनू सिंह सहित अन्य लोगों के नाम का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन नामों का सामने आना अपने आप में किसी व्यक्ति का दोष साबित नहीं करता। पुलिस को यह निर्धारित करना है कि जमीन के दस्तावेज किस आधार पर तैयार हुए, उनका इस्तेमाल कैसे किया गया और पूरी प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही। इस मामले में अहियापुर थाने में प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। पुलिस जमीन से संबंधित कागजात, राजस्व अभिलेख और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही है।

महेंद्र प्रसाद शुक्ला के खिलाफ कार्रवाई केवल जमीन के इस विवाद तक सीमित नहीं रही। राजस्व विभाग की जांच में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया और सरकारी कामकाज से संबंधित कई कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर 7 अक्टूबर को उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय सारण प्रमंडल के छपरा स्थित प्रमंडलीय आयुक्त कार्यालय निर्धारित किया गया। विभागीय जांच से जुड़ी रिपोर्टों में आरोप है कि एक नामांतरण आवेदन को लंबे समय तक लंबित रखा गया। इसके अलावा, एक मृत महिला के नाम से दर्ज आपत्ति को स्वीकार करने, जमीन के दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ और कुछ मामलों के निपटारे में नियमों का पालन नहीं करने जैसे बिंदुओं की जांच हुई। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी और अन्य राजस्व कार्यों में कथित लापरवाही का भी उल्लेख किया गया। इन आरोपों के आधार पर विभागीय कार्रवाई की गई है। वहीं, आपराधिक मामले में कौन-से आरोप साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं, इसका निर्णय पुलिस की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

जमीन के स्वामित्व में बदलाव दर्ज करने के लिए दाखिल-खारिज यानी नामांतरण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इस प्रक्रिया के तहत संबंधित दस्तावेजों और दावों की जांच के बाद राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव दर्ज किए जाते हैं। ऐसे मामलों में यदि गलत दस्तावेजों के आधार पर नामांतरण किए जाने या वास्तविक मालिक की आपत्ति को नजरअंदाज करने का आरोप सामने आता है, तो जमीन के स्वामित्व को लेकर गंभीर विवाद पैदा हो सकता है। मुशहरी अंचल से जुड़े इस मामले में भी जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि संबंधित जमीन के नामांतरण और दस्तावेजों के सत्यापन में निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं। पुलिस के लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि कथित रूप से तैयार किए गए दस्तावेजों को किस स्तर पर स्वीकार किया गया और राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव की अनुमति कैसे मिली।

महेंद्र प्रसाद शुक्ला का नाम अहियापुर क्षेत्र के एक अन्य विवादित जमीन मामले में भी सामने आने की रिपोर्ट है। इस मामले में विधायक अमित कुमार रानू, एक राजस्व कर्मचारी और अंचलाधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी दी गई है। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि दोनों मामलों के बीच कोई संबंध है या नहीं और जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े में अन्य कर्मचारियों, बिचौलियों अथवा भू-माफिया की भूमिका रही है या नहीं। जांच एजेंसियां संबंधित लोगों से पूछताछ करने और जमीन के दस्तावेजों का मिलान करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकेंगी। फिलहाल, अन्य लोगों की संलिप्तता को लेकर जांच जारी है और सभी आरोपों को न्यायिक प्रक्रिया में साबित किया जाना बाकी है।

गिरफ्तारी के बाद पुलिस की प्राथमिकता जमीन से जुड़े दस्तावेजों की कड़ियां जोड़ना, कथित हस्तांतरण की प्रक्रिया समझना और यह पता लगाना है कि इससे किसे लाभ पहुंचा। जांच में संबंधित राजस्व अभिलेखों, नामांतरण से जुड़े आवेदन और अन्य दस्तावेजों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। पुलिस यह भी देख रही है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करने वाले साक्ष्य क्या हैं और किसी अन्य व्यक्ति या अधिकारी की भूमिका सामने आती है या नहीं।