संपादकीय: न्यायालय का न्याय या एनकाउंटर? बिहार किस दिशा में बढ़ रहा है ?
- Post By Admin on Jun 18 2026
भोजपुर के भरत तिवारी की मौत केवल एक पुलिस मुठभेड़ का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसके केंद्र में कानून का शासन और न्यायपालिका की सर्वोच्चता है। सवाल केवल इतना नहीं है कि भरत तिवारी अपराधी था या नहीं। असली सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपराधी भी हो, तो क्या उसकी सजा का फैसला पुलिस करेगी ?
भरत तिवारी का एक वीडियो वायरल होता है। उसके बाद पुलिस उसे गिरफ्तार करने निकलती है। फिर खबर आती है कि पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई। पुलिस का दावा है कि उसने पुलिस टीम पर फायरिंग की, इसलिए आत्मरक्षा में जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी। वहीं परिजनों का आरोप है कि भरत सोशल मीडिया पर लाइव होकर आत्मसमर्पण करने गया था, उसने हथियार फेंक दिया था लेकिन इसके बावजूद उसे गोली मार दी गई। दोनों पक्षों के दावे बिल्कुल अलग हैं। ऐसे में सच्चाई का फैसला किसी प्रेस विज्ञप्ति, सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक बयान से नहीं हो सकता। इसका उत्तर केवल निष्पक्ष, स्वतंत्र और न्यायिक जांच ही दे सकती है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि भरत तिवारी पर पहले से कोई बड़ा आपराधिक इतिहास नहीं था, तो आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी? यदि उसने सचमुच पुलिस पर गोली चलाई, तो उसका कारण क्या था? क्या पुलिस के पास उसे जीवित गिरफ्तार करने का कोई विकल्प नहीं था? क्या पूरी कार्यवाही निर्धारित मानकों के अनुरूप हुई? इन सभी प्रश्नों का उत्तर जनता जानना चाहती है।
यदि कोई पुलिस पर हमला करता है, तो यह निस्संदेह गंभीर अपराध है। पुलिस को अपनी और जनता की सुरक्षा के लिए आवश्यक बल प्रयोग का अधिकार भी है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। लोकतंत्र में पुलिस कानून लागू करती है, कानून बनती नहीं है। अपराधी को पकड़ना पुलिस का काम है, जबकि दोष सिद्ध होने पर सजा देना न्यायालय का अधिकार है। यदि यह सीमा टूटने लगे तो संविधान की मूल भावना ही कमजोर पड़ जाएगी। घटना के बाद ग्रामीणों का आक्रोश, हंगामा और फिर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज इस बात का संकेत है कि समाज में अविश्वास गहराता जा रहा है। इसके बाद पांच पुलिसकर्मियों का निलंबन भी हुआ। लेकिन निलंबन न्याय नहीं है। यह केवल जांच की एक प्रारंभिक प्रशासनिक कार्यवाही है। असली सवाल अब भी वहीं खड़ा है क्या मुठभेड़ पूरी तरह वैध थी या नहीं? देश के कई राज्यों में वर्षों से फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगते रहे हैं। कई मामलों में न्यायालयों ने जांच के आदेश दिए, कुछ मामलों में पुलिसकर्मी दोषी भी पाए गए। यही कारण है कि प्रत्येक पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच आवश्यक मानी जाती है। यदि किसी मामले में पुलिस सही है, तो जांच उसे निर्दोष साबित करेगी। यदि कहीं अधिकारों का दुरुपयोग हुआ है, तो दोषियों को भी कानून के कठघरे में आना होगा। यही लोकतंत्र का रास्ता है। आज यदि बिना पूरी जांच के किसी मुठभेड़ को अंतिम सत्य मान लिया जाए, तो कल किसी निर्दोष की मौत को भी "अपराधी था" कहकर उचित ठहराने की कोशिश हो सकती है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक होगी। कानून की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सबसे बड़े अपराधी को भी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार देता है। यदि यह अधिकार समाप्त हो गया, तो फिर संविधान और न्यायपालिका की भूमिका पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
बिहार में अपराध पर सख्ती आवश्यक है। अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही भी होनी चाहिए। लेकिन कठोरता और कानून के शासन में अंतर होता है। यदि अपराध से लड़ने के नाम पर न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर किया गया, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को ही होगा। भरत तिवारी दोषी था या निर्दोष, इसका फैसला अदालत और गठित कमिटी निष्पक्ष जांच करेगी। लेकिन एक बात निर्विवाद है लोकतंत्र में न्यायालय की जगह कोई नहीं ले सकता। यदि पुलिस ही जांच करेगी, पुलिस ही फैसला करेगी और पुलिस ही सजा भी देगी, तो फिर संविधान की उस व्यवस्था का क्या होगा, जिसने हर नागरिक को निष्पक्ष न्याय का अधिकार दिया है? आज जरूरत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की नहीं बल्कि सच तक पहुंचने की है। सरकार को चाहिए कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराए, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे और यदि किसी स्तर पर कानून का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करे। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि यहां कानून व्यक्ति से बड़ा होता है और न्याय किसी वर्दी या पद का मोहताज नहीं होता।