संपादकीय: भूखी उम्मीदों पर टिकी सरकार, 16 रुपये के खाते में लोकतंत्र की असली तस्वीर

  • Post By Admin on Jun 19 2026
संपादकीय: भूखी उम्मीदों पर टिकी सरकार, 16 रुपये के खाते में लोकतंत्र की असली तस्वीर

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि सत्ता जनता के लिए होती है। सरकारें इस भरोसे पर बनती हैं कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और सम्मान पहुंचाएंगी। लेकिन जब एक बुजुर्ग दादी अपनी वृद्धावस्था पेंशन की उम्मीद में हर महीने बैंक का चक्कर लगाती हैं और उनके खाते में केवल 16 रुपये पड़े होते हैं, तब सवाल केवल एक पेंशन का नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना बन जाता है, जो चुनावी मंचों पर गरीबों की चिंता का दावा करती है लेकिन उनकी बुनियादी जरूरतों तक को समय पर पूरा नहीं कर पाती।

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वीडियो में एक बुजुर्ग महिला बताती हैं कि पिछले तीन-चार महीनों से उनके खाते में वृद्धा पेंशन नहीं आई है। उनकी आंखों में उम्मीद है, लेकिन बैंक खाते में केवल 16 रुपए। सोचिए, जिस उम्र में व्यक्ति को सबसे अधिक सहारे की जरूरत होती है, उसी उम्र में उसे अपने ही अधिकार के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

सवाल यह नहीं है कि पेंशन की राशि कितनी है। सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की पूरी जिंदगी अब उसी कुछ सौ रुपये पर निर्भर हो, उसके लिए तीन-चार महीने की देरी का क्या मतलब होता होगा? जिस बुजुर्ग दादी अम्मा की आय का एकमात्र आधार वही पेंशन हो, वहां रसोई कैसे जलती होगी? दवा कैसे आती होगी? भूख कैसे मिटती होगी? शायद इन सवालों का जवाब वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां बनाने वालों के पास नहीं है।

विडंबना देखिए। यदि किसी सरकारी कर्मचारी का वेतन एक महीने भी देर से आ जाए तो फाइलें दौड़ने लगती हैं, नोटशीट बनती है, वित्त विभाग सक्रिय हो जाता है और कर्मचारी संगठनों की आवाज बुलंद हो जाती है। लेकिन जब एक बुजुर्ग महिला तीन-चार महीने तक पेंशन का इंतजार करती है, तब व्यवस्था की संवेदनाएं भी मानो छुट्टी पर चली जाती हैं। क्या गरीब की परेशानी परेशानी नहीं होती? क्या वृद्ध की भूख, भूख नहीं होती? चुनाव के समय नेताओं के भाषणों में गरीब सबसे पहले आता है। मंचों से कहा जाता है कि बुजुर्गों का सम्मान हमारी प्राथमिकता है, सामाजिक सुरक्षा हमारी प्रतिबद्धता है और किसी गरीब को परेशानी नहीं होने दी जाएगी। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही गरीब सरकारी पोर्टलों, बैंकों और कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हो जाता है। तब उसे केवल आश्वासन मिलता है "अगले महीने आ जाएगा", "तकनीकी समस्या है", "फाइल लंबित है", "ऊपर से पैसा नहीं आया"। आखिर कब तक?

सरकारें अक्सर यह कहकर अपनी पीठ थपथपाती हैं कि करोड़ों लोगों के खातों में सीधे लाभ पहुंचाया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो फिर ऐसी दादी अम्माओं के खाते महीनों तक खाली क्यों रहते हैं? यदि योजना इतनी सफल है, तो फिर उसके लाभार्थी बैंक की कतारों से निराश क्यों लौटते हैं? यदि व्यवस्था पारदर्शी है, तो फिर जवाबदेही किसकी तय होगी? यह केवल बिहार का नहीं, बल्कि पूरे देश की बुजुर्ग सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का सवाल है। वृद्धावस्था पेंशन कोई एहसान नहीं है। यह उन लोगों का अधिकार है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाज, परिवार और देश के निर्माण में लगा दी। बुढ़ापे में उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन देना सरकार का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है न कि राजनीतिक उपकार। इस मामले में बिहार सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किन कारणों से महीनों तक पेंशन का भुगतान नहीं हो पा रहा है। यदि तकनीकी समस्या है तो उसका समाधान कब होगा? यदि प्रशासनिक लापरवाही है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्यवाही होगी? और यदि वित्तीय संकट है तो चुनावी घोषणाओं में किए गए वादों का क्या अर्थ रह जाता है?

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए। गरीबों के नाम पर राजनीति करने से कहीं अधिक आवश्यक है कि गरीबों तक उनका अधिकार समय पर पहुंचे। योजनाओं की सफलता विज्ञापनों से नहीं, बल्कि लाभार्थियों के चेहरे की मुस्कान से मापी जाती है। सरकार को तय करना होगा कि वह गरीबों को सम्मान देना चाहती है या केवल चुनावी भाषणों में उनका नाम लेना चाहती है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध किसी गरीब की उम्मीद को तोड़ना होता है। उस दादी के खाते में भले ही केवल 16 रुपये हों, लेकिन उनके टूटते भरोसे की कीमत करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन भी नहीं चुका सकते। याद रखिए, चुनाव के समय गरीब केवल वोटर नहीं होता, वह सम्मान का हकदार नागरिक भी होता है। यदि सरकार समय पर उसकी पेंशन तक नहीं पहुंचा सकती, तो उसे अपनी उपलब्धियों के ढोल पीटने से पहले उन खाली खातों और सूनी आंखों में झांकना चाहिए, जहां आज भी उम्मीद जिंदा है लेकिन व्यवस्था बार-बार उसे निराश कर रही है।