संपादकीय: गड्ढों का स्वर्णिम युग और गन्ने के रस की महान गाथा

  • Post By Admin on Jun 13 2026
संपादकीय: गड्ढों का स्वर्णिम युग और गन्ने के रस की महान गाथा

माननीय मंत्री महोदय,

आपको साधुवाद! देश में विकास की जो नई परिभाषा आपने गढ़ी है, वह अद्भुत है। पहले लोग सड़क पर गाड़ी चलाते थे, अब गड्ढों के बीच सड़क खोजते हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों की हालत देखकर लगता है कि टोल टैक्स सड़क निर्माण के लिए नहीं, बल्कि गड्ढों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वसूला जा रहा है। कहीं-कहीं तो गड्ढे इतने आत्मनिर्भर हो चुके हैं कि सड़क उन पर आश्रित दिखाई देती है।

वैसे आपकी दूरदृष्टि की प्रशंसा करनी होगी। सड़क विभाग की परेशानियों में उलझने के बजाय आपने पेट्रोल में गन्ने का रस मिलाकर राष्ट्र निर्माण का जो अभिनव प्रयोग किया है, वह इतिहास में दर्ज किया जाएगा। जनता भले ही वाहन के माइलेज और इंजन की चिंता करे, लेकिन राष्ट्रहित में कुछ बलिदान तो देना ही पड़ता है। आखिर परिवार, उद्योग और नीति-तीनों का समन्वय भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।

जनता पूछती है कि यदि ई-20 पेट्रोल इतना ही चमत्कारी है तो विभिन्न कंपनियों के वाहनों पर लंबी अवधि के स्वतंत्र परीक्षणों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? मगर जनता भी बड़ी नासमझ है। उसे आंकड़ों से क्या लेना? उसे तो बस अपनी जेब, इंजन और माइलेज की पड़ी रहती है। देश का वाहन मालिक भी बड़ा अजीब जीव है। गाड़ी खरीदते समय टैक्स देता है, पेट्रोल पर टैक्स देता है, टोल देता है, बीमा देता है, सर्विस पर खर्च करता है और फिर भी शिकायत करता है कि उसकी गाड़ी का माइलेज कम हो गया। अरे भैया, राष्ट्रहित में कुछ योगदान तुम्हें भी देना चाहिए! विकास केवल भाषणों से थोड़े होता है।

और यह जो लोग कह रहे हैं कि उनकी गाड़ी पहले 14-15 किलोमीटर प्रति लीटर चलती थी और अब मुश्किल से 6-8 किलोमीटर चल रही है, तो यह भी सकारात्मक सोच का अभाव है। इसे नुकसान नहीं, बल्कि "वक्तिगत अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी" समझना चाहिए। जितना ज्यादा पेट्रोल जलेगा, उतनी ज्यादा बिक्री होगी, उतना ज्यादा आपके परिवार में राजस्व आएगा और उतना ही आपके परिवार का विकास होगा। गणित बिल्कुल स्पष्ट है।

एक और बात समझ से परे है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल कई बार सस्ता पड़ जाता है तो फिर गन्ने से ईंधन बनाने की इतनी बेचैनी क्यों है? लेकिन शायद यह हमारी सीमित बुद्धि का दोष है। बड़े फैसलों के पीछे बड़ी दूरदृष्टि होती है, जिसे आम आदमी समझ नहीं पाता। आम आदमी तो बस इतना जानता है कि पानी की कमी वाले देश में हजारों लीटर पानी खर्च कर ईंधन बनाना कुछ अटपटा लगता है।

विपक्ष भी कमाल का है। जनता सोशल मीडिया पर चीख रही है, वाहन मालिक परेशान हैं, लेकिन विपक्ष शायद अभी भी किसी उचित मुहूर्त की प्रतीक्षा में है। लोकतंत्र में जनता की आवाज़ उठाना विपक्ष का धर्म माना जाता है, लेकिन धर्म निभाने से पहले राजनीतिक गणित का पाठ पढ़ना भी आवश्यक हो गया है। कुल मिलाकर देश एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। सड़कें गड्ढों से समृद्ध हैं, पेट्रोल प्रयोगशाला बन चुका है, वाहन मालिक शोध का विषय बन चुका है और जनता से अपेक्षा की जा रही है कि वह इसे विकास का उत्सव माने।

हे सत्ता के महारथियों! यदि संभव हो तो जनता पर एक कृपा और कर दीजिए। पुराना पेट्रोल वापस ले आइए, चाहे कुछ महंगा ही कर दीजिए। कम-से-कम आम आदमी को यह संतोष तो रहेगा कि उसकी गाड़ी, उसका इंजन और उसकी जेब, तीनों एक साथ दम नहीं तोड़ेंगे। बाकी तो लोकतंत्र है, जनता है, चुनाव हैं और ईवीएम के सामने खड़ा वह मतदाता भी है, जिसकी स्मृति कभी-कभी नेताओं की कल्पना से अधिक लंबी निकल जाती है।