बकाया अनुदान और वेतनमान न मिलने से नाराज शिक्षक, तिरहुत निर्वाचन में बदल सकते हैं समीकरण
- Post By Admin on Oct 13 2026
मुजफ्फरपुर : बिहार के संबद्ध महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षक इस समय गंभीर आर्थिक संकट और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। सरकार द्वारा ठोस वेतनमान लागू न करने, वर्षों से बकाया अनुदान लंबित रखने और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का पारिश्रमिक न मिलने के कारण शिक्षकों में गहरा असंतोष है। यह नाराजगी आगामी तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में चर्चा है कि शिक्षकों का यह गुस्सा चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
वेतनमान और सेवा सुरक्षा की मांग अधर में
संबद्ध कॉलेजों के शिक्षक लंबे समय से सम्मानजनक वेतनमान, नियमित वित्तीय सहायता, बकाया अनुदान के समयबद्ध भुगतान और सेवा सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे न केवल शिक्षण कार्य करते हैं, बल्कि विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के संचालन और मूल्यांकन जैसी जटिल जिम्मेदारियों को भी निष्ठापूर्वक निभाते हैं। इसके बावजूद उनकी आर्थिक सुरक्षा और सेवा शर्तों को लेकर ठोस कदम न उठाया जाना बेहद निराशाजनक है।
बकाया अनुदान के कारण दुर्गा पूजा पर आर्थिक तंगी का साया
अनुदान का भुगतान न होने से शिक्षकों के परिवारों के सामने आर्थिक परेशानियां खड़ी हो गई हैं। बच्चों की पढ़ाई, घरेलू खर्च और आवश्यक जिम्मेदारियों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में दुर्गा पूजा जैसे प्रमुख त्योहार के अवसर पर भी शिक्षकों के घरों में मायूसी का माहौल रहने की आशंका है। शिक्षकों का मानना है कि महीनों तक पारिश्रमिक न मिलने से पर्व-त्योहारों की खुशियां भी आर्थिक चिंताओं के बोझ तले दब रही हैं।
कॉपी मूल्यांकन का पारिश्रमिक लंबित, मनोबल पर असर
शिक्षकों के आक्रोश की एक बड़ी वजह मूल्यांकन कार्य के पारिश्रमिक का भुगतान न होना भी है। अपनी नियमित जिम्मेदारियों से अतिरिक्त श्रम करने के बाद भी समय पर भुगतान न मिलने से शिक्षकों का मनोबल गिर रहा है और विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली के प्रति असंतोष बढ़ रहा है।
तिरहुत शिक्षक निर्वाचन में बदल सकते हैं समीकरण
आगामी तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों का रुख बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। वेतनमान, बकाया अनुदान और मूल्यांकन पारिश्रमिक जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं। यदि शिक्षकों की यह नाराजगी मतदान में उदासीनता या सत्तापक्ष और प्रतिनिधियों के विरोध के रूप में सामने आई, तो इसका सीधा असर नतीजों पर पड़ेगा। शिक्षकों के लिए यह चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने का जरिया नहीं, बल्कि अपने हक, सम्मान और भविष्य के लिए संघर्ष का मंच बन चुका है।
*सांकेतिक तस्वीर*