BRABU में धरना के तीसरे दिन बच्चों की स्थिति नाजुक, कुलपति बेसुध

  • Post By Admin on Oct 02 2026
BRABU में धरना के तीसरे दिन बच्चों की स्थिति नाजुक, कुलपति बेसुध

मुजफ्फरपुर: विश्वविद्यालय में जारी छात्र आंदोलन का आज तीसरा दिन है। दो छात्र अनशन पर बैठे हैं और आंदोलन अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां केवल आश्वासन और अपील से बात बनती दिखाई नहीं देती। छात्रों का कहना है कि उनकी मांगें लंबे समय से लंबित हैं और पूर्व में मिले आश्वासनों के बावजूद धरातल पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में उन्होंने इस बार लिखित और ठोस निर्णय के बिना आंदोलन समाप्त नहीं करने का रुख अपनाया है।

इस पूरे घटनाक्रम को केवल विश्वविद्यालय परिसर के भीतर चल रहा एक सामान्य छात्र आंदोलन मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। छात्रावास आवंटन, नामांकन शुल्क की वापसी, पुस्तकालय और प्रयोगशाला जैसी सुविधाएं सीधे छात्रों की शिक्षा और उनके अधिकारों से जुड़ी हुई मांगें हैं। यदि इन मांगों को लेकर छात्र लगातार धरना और भूख हड़ताल का रास्ता अपनाने को मजबूर हैं, तो यह विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। दूसरी ओर, छात्रों के आंदोलन की अपनी मर्यादा और जिम्मेदारी भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगों को रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन आंदोलन शांतिपूर्ण और अनुशासित रहना चाहिए। इसी तरह प्रशासन की जिम्मेदारी भी केवल भीड़ को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं हो सकती। प्रशासन को छात्रों की शिकायतों को सुनना, उनकी वैधता की जांच करना और जिन मांगों पर निर्णय संभव है, उन पर समयबद्ध कार्रवाई करना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल भरोसे का है। जब छात्र यह कह रहे हों कि पहले भी आश्वासन मिले लेकिन मांगें पूरी नहीं हुईं, तब केवल मौखिक आश्वासन उनके भीतर विश्वास पैदा नहीं कर सकता। ऐसे समय में संवाद के साथ-साथ लिखित निर्णय, स्पष्ट समयसीमा और कार्रवाई की पारदर्शी जानकारी ही गतिरोध को समाप्त करने का रास्ता बन सकती है। भूख हड़ताल का तीसरा दिन और दो छात्रों का लगातार अनशन किसी भी संवेदनशील प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। अनशन पर बैठे छात्रों के स्वास्थ्य की निगरानी भी जरूरी है और उनकी मांगों पर गंभीरता से बातचीत भी। किसी भी पक्ष की जीत से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विवाद का समाधान निकले और छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

इसलिए अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप बढ़ाने की नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन और आंदोलनकारी छात्रों के बीच सीधे और सार्थक संवाद की है। प्रशासन अपनी ओर से जो भी निर्णय ले, उसे स्पष्ट रूप से सामने रखे और छात्र भी उन निर्णयों पर तथ्यात्मक रूप से अपनी प्रतिक्रिया दें। छात्रों की आवाज को सुना जाना चाहिए, लेकिन उस आवाज का समाधान तक पहुंचना उससे भी अधिक जरूरी है। आज जब आंदोलन का तीसरा दिन है, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छात्र कब तक धरने पर बैठेंगे। बड़ा सवाल यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन कब तक इस आवाज को केवल एक आंदोलन समझेगा और कब इसे उन समस्याओं के रूप में देखेगा, जिनके समाधान की जिम्मेदारी उसी व्यवस्था पर है।