रामचंद्र शाही संग्रहालय में सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर हुई सार्थक चर्चा
- Post By Admin on Jul 23 2026
मुजफ्फरपुर: मुजफ्फरपुर के मीठनपुरा स्थित बिहार सरकार के रामचंद्र शाही संग्रहालय में गुरुवार को सहायक संग्रहालयाध्यक्ष सुजीत कुमार तिवारी से शिष्टाचार मुलाकात की गई। इस दौरान सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, लोककला, लोकसंस्कृति और संग्रहालय की भूमिका को लेकर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
मुलाकात में रामचंद्र शाही संग्रहालय की सलाहकार समिति के सदस्य एवं समाजसेवी शंभु मोहन प्रसाद के नेतृत्व में सरला श्रीवास सामाजिक-सांस्कृतिक शोध संस्थान के संयोजक एवं वरिष्ठ कठपुतली कलाकार सुनील कुमार तथा शांति सेना के संयोजक सोनू सरकार शामिल हुए। सहायक संग्रहालयाध्यक्ष सुजीत कुमार तिवारी ने कहा कि रामचंद्र शाही संग्रहालय मुजफ्फरपुर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा उन्हें भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि मुजफ्फरपुर केवल विश्वप्रसिद्ध शाही लीची के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध कला, लोकसंस्कृति, लोक परंपराओं और लहठी शिल्प जैसी सांस्कृतिक धरोहरों के कारण भी विशिष्ट पहचान रखता है। इन विरासतों का संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
इस अवसर पर समाजसेवी एवं संग्रहालय सलाहकार समिति के सदस्य शंभु मोहन प्रसाद ने सहायक संग्रहालयाध्यक्ष सुजीत कुमार तिवारी को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। वहीं वरिष्ठ कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने अपनी चर्चित पुस्तक "लीचीया लाले लाल" (लीची लोकगीत संग्रह) उन्हें भेंट की। सुनील कुमार ने बताया कि "लीचीया लाले लाल" का प्रकाशन शाही लीची की मिठास और "मीठा मुस्कुराने" के संदेश को लोकसंगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने कहा कि लोकगीत किसी भी समाज की सांस्कृतिक आत्मा होते हैं, जिनमें जनजीवन की संवेदनाएं, परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत जीवंत रूप में सुरक्षित रहती हैं।
शांति सेना के संयोजक सोनू सरकार ने कहा कि लोकसंगीत समाज की स्मृतियों को संजोने और लोगों को एक सूत्र में बांधने का सबसे प्रभावी माध्यम है। लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होकर समाज की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं। बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि मुजफ्फरपुर की सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त बनाने के लिए रामचंद्र शाही संग्रहालय को लोककला, लोकसंगीत, कठपुतली कला और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही संग्रहालय के माध्यम से जनजागरूकता बढ़ाने तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भविष्य में विभिन्न संयुक्त कार्यक्रम आयोजित करने पर भी सकारात्मक चर्चा हुई।