शांति के मसीहा डॉ. एस. एन. सुब्बा राव का 97वां जन्मदिन, भारत जोड़ो के संदेश से गूंजा बिहार
- Post By Admin on Feb 06 2026
मुजफ्फरपुर : शांति, सद्भाव और सामाजिक एकता के प्रतीक माने जाने वाले आदरणीय डॉ. एस. एन. सुब्बा राव (भाई जी) के 97वें जन्मदिन पर बिहार समेत देशभर में उनके योगदान को श्रद्धा के साथ याद किया गया। सामाजिक संगठनों और युवाओं ने उन्हें “शांति का मसीहा” बताते हुए उनके विचारों को आज के दौर में भी प्रासंगिक बताया।
इस अवसर पर प्रयत्न संस्था के संस्थापक प्रभात कुमार ने कहा कि डॉ. सुब्बा राव ने समाज को जोड़ने का जो सपना देखा था, वह आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है। प्रभात कुमार ने कहा, “भाई जी सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वे एक विचार थे, जो नफरत के अंधेरे में भी प्रेम और एकता की रोशनी जलाते रहे। उन्होंने हमें सिखाया कि असली राष्ट्र निर्माण दिलों को जोड़ने से होता है, दीवारें खड़ी करने से नहीं।”
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि भाई जी ने युवाओं को एक सूत्र में बांधकर सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाया और समाज परिवर्तन की सोच दी। उनके लोकप्रिय नारे—“जाति-पाति के बंधन तोड़ो, भारत जोड़ो”, “नफरत छोड़ो, दिल को जोड़ो”—आज भी सामाजिक आंदोलनों की प्रेरणा बने हुए हैं।
कर्नाटक में 7 फरवरी 1929 को जन्मे डॉ. सुब्बा राव का बिहार से गहरा रिश्ता रहा। 80 और 90 के दशक में जब चंपारण अपराध और हिंसा के कारण ‘मिनी चंबल’ के रूप में बदनाम हो रहा था, तब भाई जी ने राष्ट्रीय शिविरों के माध्यम से अपराधियों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया और शांति बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी तरह जहानाबाद में जातीय हिंसा के दौर में उन्होंने राष्ट्रीय शिविर आयोजित कर ‘भारत जोड़ो’ का संदेश दिया, जिससे वहां का माहौल धीरे-धीरे सद्भाव में बदला। मुजफ्फरपुर-वैशाली सीमा पर धार्मिक तनाव के समय भी भाई जी ने सर्वधर्म प्रार्थना सभा कराकर लोगों को आपसी भाईचारे का संदेश दिया।
प्रयत्न संस्था के संस्थापक प्रभात कुमार ने कहा, “आज जब समाज में नफरत और विभाजन की राजनीति बढ़ रही है, ऐसे समय में भाई जी के विचार पहले से ज्यादा जरूरी हो गए हैं। उनका पूरा जीवन हमें यह सिखाता है कि शांति सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष और संवाद का परिणाम होती है।”
सामाजिक संगठनों का मानना है कि डॉ. एस. एन. सुब्बा राव का जीवन समाज को जोड़ने, हिंसा को संवाद में बदलने और प्रेम व करुणा के मूल्यों को मजबूत करने का प्रेरक उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी सामाजिक परिवर्तन की राह दिखाता रहेगा।