नवगीत दिवस पर मुजफ्फरपुर में साहित्यिक संगोष्ठी, लय-संवेदना की लोकधारा पर हुआ गहन विमर्श

  • Post By Admin on Feb 05 2026
नवगीत दिवस पर मुजफ्फरपुर में साहित्यिक संगोष्ठी, लय-संवेदना की लोकधारा पर हुआ गहन विमर्श

मुजफ्फरपुर: आमगोला स्थित शुभानंदी परिसर में नवगीत कुटुंब के तत्वावधान में नवगीत दिवस का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नवगीत की परंपरा, इतिहास, विकास और उसकी समकालीन भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ, वहीं गीत और नवगीत की सस्वर प्रस्तुतियों से पूरा परिसर गूंजता रहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. ममता रानी ने कहा कि मुजफ्फरपुर पहले से ही अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा के लिए राष्ट्रीय फलक पर प्रतिष्ठित रहा है। इसी नगर के कविवर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने 5 फरवरी 1958 को नए तेवर, नए कथ्य और नए शिल्प के गीतों को गीतांगिनी के रूप में संग्रहित करते हुए पहली बार नवगीत शब्द का प्रयोग किया। नई कविता के साथ-साथ नवगीत की भी यात्रा यहीं से आरंभ हुई, जिसने हिंदी गीत परंपरा को नई दिशा दी।

नवगीत: इतिहास, विकास और विस्तार विषय पर विस्तार से बोलते हुए डॉ. संजय पंकज ने कहा कि नवगीत किसी प्रवृत्ति के विरोध में नहीं, बल्कि गीतधारा के स्वाभाविक और नव्यतम विकसित रूप के रूप में सामने आया। इसमें थके, हारे, टूटे, घबराए और डरे हुए मनुष्य तथा लोक-जीवन की गहरी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति मिलती है। परंपरा से समृद्ध नवगीत आज अपने लोकोन्मुखी भाव और लोक व्यंजना के कारण निरंतर विकसित हो रहा है। उन्होंने कहा कि नवीनता के प्रति आग्रह रखने वाले और सतत प्रयोगधर्मी कवि-गीतकार राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नई त्वरा और ऊर्जा से भरे गीतों को चिन्हित कर उनकी प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया। जीवन दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व बोध, प्रीति तत्व और परिसंचय जैसे तत्व नवगीत में प्रमुखता से उभरते हैं। निराला, पंत, अज्ञेय और जानकीवल्लभ शास्त्री के गीतों में हुए नूतन प्रयोगों को भी राजेंद्र प्रसाद सिंह ने पहचानते हुए संकलित किया। डॉ. संजय पंकज ने आगे कहा कि हिंदी के काव्य आंदोलनों में नवगीत सर्वाधिक समय तक चलने वाला वैज्ञानिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक गीत-अभियान है। नवगीत लय और संवेदना की लोकधारा है, जिसमें राग, विराग और अनुराग की तरंगें उठती और लहराती हैं। आज विराट फलक पर बहुगंधी नवगीत लिखे जा रहे हैं और एक साथ कई पीढ़ियां नवगीत रचना की नई जमीन उकेर रही हैं।

डॉ. रंजीत पटेल ने कहा कि कविता की सहज प्रकृति मूलतः गीतात्मक है और नवगीत गीतितत्वों का नव्य तथा व्यापक निरूपण प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि नवगीत दिवस का आयोजन इसके उद्भव, स्थापना और विकास की चेतना को गीतकारों से जोड़ने और उन्हें प्रेरित करने का सार्थक प्रयास है। इस अवसर पर डॉ. पुष्पा प्रसाद, डॉ. वंदना विजय लक्ष्मी और डॉ. केशव किशोर कनक ने भी अपने विचार रखते हुए नवगीत की वैचारिक और सौंदर्यात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डाला।

विचार-विमर्श के बाद आयोजित गीत गोष्ठी ने आयोजन को स्मरणीय बना दिया। डॉ. ममता रानी ने अपने गीत के माध्यम से स्त्री-पुरुष अस्मिता बोध को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। डॉ. संजय पंकज ने सामाजिक विसंगतियों को उजागर करता नवगीत सस्वर प्रस्तुत किया। डॉ. रंजीत पटेल ने विकासवाद की त्रासदी को शब्दों में पिरोया। डॉ. पुष्पा प्रसाद ने ऋतुराज का स्वागत करते हुए गीत प्रस्तुत किया। सविता राज के गीत से प्रेम की शाश्वतता का अनुभव हुआ, जबकि वंदना विजय लक्ष्मी ने डॉ. शिवदास पांडेय के गीत का सस्वर पाठ कर गीत-पुरुष को जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम में प्रमोद आजाद, संजीव साहु, प्रो तारिक इमाम, प्रेमभूषण, चैतन्य चेतन, अनुराग आनंद, राकेश कुमार सिंह और माला कुमारी की सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम का संचालन डॉ. संजय पंकज ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रमोद आजाद द्वारा किया गया। नवगीत दिवस का यह आयोजन न केवल विचार और विमर्श का मंच बना, बल्कि नवगीत की लय, संवेदना और लोकधारा को जीवंत रूप में अनुभव करने का अवसर भी प्रदान करता रहा।