आशा कार्यकर्ताओं की सक्रियता और एफसीएम थेरेपी से सुरक्षित मातृत्व की बढ़ी उम्मीद
- Post By Admin on Jun 07 2026
लखीसराय : गर्भावस्था के दौरान होने वाला गंभीर एनीमिया मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है। ऐसे में समय पर पहचान, उचित उपचार और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों की सक्रियता कई महिलाओं के लिए सुरक्षित मातृत्व की राह आसान बना रही है। लखीसराय जिले में भी एफसीएम (फेरिक कार्बोक्सी माल्टोज) उपचार के माध्यम से गंभीर एनीमिया से जूझ रही गर्भवती महिलाओं को राहत मिल रही है।
जिले की गर्भवती महिला प्रियंका कुमारी इसका एक उदाहरण हैं। चिकित्सकों द्वारा उन्हें आयरन की गोलियां दी गई थीं, लेकिन उनका शरीर आयरन को पर्याप्त मात्रा में अवशोषित नहीं कर सका। पहली जांच में उनका हीमोग्लोबिन स्तर 8.3 ग्राम प्रति डेसीलीटर था, जो बाद में बढ़ने के बजाय घटकर 8.1 ग्राम प्रति डेसीलीटर पर पहुंच गया। लगातार कमजोरी, चक्कर और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ने के कारण उनकी स्थिति चिंताजनक हो गई।
इसी दौरान गांव की आशा कार्यकर्ता किरण कुमारी ने उन्हें नियमित प्रसव पूर्व जांच कराने के लिए प्रेरित किया तथा परिवार की आशंकाओं को दूर किया। जांच के बाद चिकित्सकों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए एफसीएम का सिंगल डोज दिया। उपचार के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार दर्ज किया गया। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यह उदाहरण बताता है कि सुरक्षित मातृत्व केवल दवाओं पर नहीं, बल्कि समय पर जांच, सही चिकित्सकीय परामर्श और समुदाय के भरोसे पर भी निर्भर करता है।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा शोध और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में गर्भावस्था के दौरान एनीमिया मातृ मृत्यु, समयपूर्व प्रसव और कम वजन वाले शिशुओं के जन्म का प्रमुख कारण है। उन्होंने कहा कि गंभीर एनीमिया के मामलों में केवल आयरन की गोलियों पर निर्भर रहने के बजाय समय पर दी गई इंटरवेनेस आयरन थेरेपी, जैसे एफसीएम, हीमोग्लोबिन स्तर में तेजी से सुधार ला सकती है। यही कारण है कि जोखिम वाली गर्भवतियों की शीघ्र पहचान और त्वरित उपचार पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
915 गर्भवतियों को एफसीएम देने का लक्ष्य
सिविल सर्जन डॉ. जयप्रकाश सिंह ने बताया कि जिले में गंभीर एनीमिया से प्रभावित गर्भवती महिलाओं की पहचान और उपचार के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। वर्ष 2026 के लिए जिले में 915 गर्भवती महिलाओं को एफसीएम उपचार उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अब तक 228 ऐसी गर्भवती महिलाओं की पहचान की जा चुकी है, जिन्हें चिकित्सकीय मानकों के अनुसार एफसीएम की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि समय पर स्क्रीनिंग और हीमोग्लोबिन स्तर की नियमित जांच से एनीमिया की गंभीरता कम करने के साथ-साथ मातृ एवं नवजात मृत्यु के जोखिम को भी घटाया जा सकता है। इसी उद्देश्य से प्रसव पूर्व जांच के दौरान जोखिम वाली गर्भवतियों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर उपचार से जोड़ा जा रहा है।
आशा और एएनएम बनीं स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी
जिला कार्यक्रम प्रबंधक सुधासुं नारायण लाल ने बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से जुड़ी गर्भवती महिलाओं में प्रसव पूर्व जांच सेवाओं का उपयोग अधिक प्रभावी रहा तथा स्वास्थ्य संबंधी व्यवहारों में सकारात्मक सुधार देखा गया।
उन्होंने बताया कि लखीसराय में आशा और एएनएम कार्यकर्ता घर-घर जाकर गर्भवती महिलाओं से संवाद स्थापित कर रही हैं, नियमित जांच सुनिश्चित कर रही हैं तथा गंभीर एनीमिया से प्रभावित महिलाओं को समय पर उपचार से जोड़ रही हैं। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यही भरोसा स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक ताकत है।
सुरक्षित मातृत्व के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मातृत्व केवल एक महिला का व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए एनीमिया जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए चिकित्सा सेवाओं के साथ-साथ सामुदायिक जागरूकता और जनविश्वास भी उतना ही आवश्यक है।
लखीसराय में एफसीएम उपचार, नियमित जांच और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से सुरक्षित मातृत्व की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को उम्मीद है कि इस पहल से मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य संकेतकों में और सुधार होगा।