दिनकर की अमर कृति 'रश्मिरथी' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, एलएस कॉलेज में जुटे देशभर के साहित्यकार

  • Post By Admin on Jul 17 2026
दिनकर की अमर कृति 'रश्मिरथी' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, एलएस कॉलेज में जुटे देशभर के साहित्यकार

मुजफ्फरपुर : ऐतिहासिक लंगट सिंह महाविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग की ओर से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की कालजयी कृति 'रश्मिरथी' के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शुक्रवार को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। 'रश्मिरथी : आधुनिक संदर्भ में' विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के प्रख्यात साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लेकर दिनकर की साहित्यिक विरासत और कृति की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।

महाविद्यालय के कृपलानी सभागार में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने की। उन्होंने कहा कि लंगट सिंह महाविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य और राष्ट्रकवि दिनकर की सृजन-यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1950 से मार्च 1952 तक दिनकर एलएस कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे और इसी दौरान उनकी अमर काव्य-कृति 'रश्मिरथी' की वैचारिक आधारशिला तैयार हुई। प्राचार्या ने कहा कि 'रश्मिरथी' महाभारत के पात्र कर्ण की कथा भर नहीं, बल्कि समाज के उन शोषित, उपेक्षित और प्रतिभाशाली लोगों की आवाज है, जो अपनी योग्यता के बल पर सम्मानजनक स्थान पाने का संघर्ष करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी में राष्ट्रवाद, स्वाभिमान और साहित्यिक चेतना का संचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता प्रख्यात कवि एवं साहित्यकार डॉ. संजय पंकज ने कहा कि 'रश्मिरथी' केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि दिनकर की यह कृति आज भी समाज के ज्वलंत प्रश्नों को नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। दिनकर स्मृति न्यास, पटना के सचिव अरविन्द कुमार सिंह ने अपने संबोधन में 'रश्मिरथी' के तृतीय सर्ग का ओजपूर्ण पाठ किया। उन्होंने कहा कि दिनकर की लेखनी समाज की कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष और न्याय की स्थापना का सशक्त माध्यम रही है।

कार्यक्रम की समन्वयक एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राधा कुमारी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि राष्ट्रकवि दिनकर की साहित्यिक विरासत को संरक्षित करना और उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हिन्दी विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। संगोष्ठी में प्रो. एस.आर. चतुर्वेदी, प्रो. पुष्पा कुमारी, डॉ. शशिकांत पाण्डेय, डॉ. रीमा कुमारी, डॉ. वेदप्रकाश दुबे, डॉ. नवीन कुमार, डॉ. सुधांशु, डॉ. आनंद कुमार सिंह सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।