'आषाढ़ का एक दिन' का सफल मंचन, प्रेम, त्याग और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत चित्रण
- Post By Admin on Jul 17 2026
पटना: सांस्कृतिक संस्था इमैजिनेशन, बिहार की ओर से शुक्रवार को पटना के प्रेमचंद रंगशाला में आधुनिक हिंदी रंगमंच के प्रमुख नाटककार मोहन राकेश के कालजयी नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का प्रभावशाली मंचन किया गया। वरिष्ठ रंगनिर्देशक कुंदन कुमार के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाट्य प्रस्तुति ने प्रेम, सृजन, महत्वाकांक्षा, त्याग और मानवीय संबंधों के जटिल पक्षों को संवेदनशीलता और कलात्मक सौंदर्य के साथ मंच पर जीवंत कर दिया। प्रस्तुति के समापन पर कलाकारों को दर्शकों ने देर तक तालियां बजाकर सराहा।
नाटक की शुरुआत वर्षा, मेघ गर्जन और प्रकृति के मनोहारी वातावरण से हुई, जिसने दर्शकों को आरंभ से ही कथा की भावभूमि से जोड़ दिया। पूरी प्रस्तुति के दौरान दर्शक पात्रों की भावनात्मक यात्रा के साथ स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते रहे। 'आषाढ़ का एक दिन' केवल महाकवि कालिदास के जीवन की कथा नहीं, बल्कि हर उस सृजनशील व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व की कहानी है, जिसे प्रेम और प्रतिष्ठा, निजी संबंधों और सार्वजनिक दायित्वों तथा संवेदनाओं और महत्वाकांक्षाओं के बीच कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। नाटक कालिदास और मल्लिका के निष्कलुष प्रेम के माध्यम से यह प्रश्न उठाता है कि क्या बड़ी उपलब्धियों की कीमत हमेशा व्यक्तिगत सुख और आत्मीय संबंधों से चुकानी पड़ती है।
प्रस्तुति में मल्लिका के निस्वार्थ प्रेम, अंबिका की व्यावहारिक सोच, विलोम के यथार्थवादी दृष्टिकोण और कालिदास के मनोवैज्ञानिक संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। उज्जयिनी के राजदरबार का आकर्षण और राजकवि बनने की प्रतिष्ठा कालिदास को अपनी जन्मभूमि और मल्लिका से दूर ले जाती है, जबकि मल्लिका अपने प्रेम और समर्पण के साथ प्रतीक्षा और अकेलेपन को स्वीकार करती है। यही भावनात्मक संघर्ष नाटक की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरता है। निर्देशक कुंदन कुमार ने मोहन राकेश की मूल संवेदना को अक्षुण्ण रखते हुए संवाद, मौन, प्रतीकों और दृश्य संरचना के माध्यम से पात्रों के अंतर्द्वंद्व को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया। प्रतीकात्मक रंगमंच, संतुलित मंच सज्जा, प्रभावी प्रकाश व्यवस्था और संगीत ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बनाया। कालिदास की भूमिका में सत्यम सिंह और मल्लिका की भूमिका में जानवी सोनी ने अपने संवेदनशील अभिनय से दर्शकों को भावुक कर दिया। विलोम की भूमिका में विशाल सिंह ने अपने प्रभावी अभिनय से चरित्र के यथार्थवादी पक्ष को उभारा, जबकि अंबिका की भूमिका में गरिमा त्रिपाठी ने एक मां की पीड़ा और व्यावहारिक सोच को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया।
अन्य कलाकारों में प्रियंगुमंजरी की भूमिका रीतिका उपाध्याय, दंतुल की भूमिका पीयूष ओझा, मातुल की भूमिका कुणाल कुमार, अनुनासिक की भूमिका सौरभ पाठक, रंगिनी की भूमिका रूपाली सिन्हा तथा निक्षेप की भूमिका शिवम भारद्वाज ने निभाई। सभी कलाकारों ने अपने सधे हुए अभिनय से प्रस्तुति को यादगार बना दिया। नाटक की प्रकाश व्यवस्था रौशन कुमार ने संभाली, मंच सज्जा प्रेमचंद कुमार और सौरभ पाठक ने की, जबकि किशन कन्हैया के संगीत ने प्रस्तुति के भावनात्मक प्रभाव को और अधिक सशक्त बनाया।
प्रस्तुति के अंत में दर्शकों ने कलाकारों और पूरी तकनीकी टीम का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। यह मंचन केवल एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि कलाकार की रचनात्मक स्वतंत्रता, सफलता की आकांक्षा और मानवीय रिश्तों के बीच उत्पन्न द्वंद्व पर गंभीर विमर्श के रूप में सामने आया। दशकों पहले लिखे जाने के बावजूद 'आषाढ़ का एक दिन' की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही सशक्त दिखाई दी, जिसने दर्शकों को मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों के महत्व पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित किया।