“मां शब्दातीत होती है”, श्रद्धा-संवाद और काव्यांजलि में भावनाओं से सराबोर हुआ साहित्यिक वातावरण

  • Post By Admin on Jun 05 2026
“मां शब्दातीत होती है”, श्रद्धा-संवाद और काव्यांजलि में भावनाओं से सराबोर हुआ साहित्यिक वातावरण

मुजफ्फरपुर: शहर के आमगोला स्थित शुभानंदी परिसर में पुण्यात्मा प्रतिभा सिन्हा की स्मृति में आयोजित “नमन-वंदन” कार्यक्रम के अंतर्गत श्रद्धा-संवाद एवं काव्यांजलि का आयोजन भावनात्मक और साहित्यिक ऊंचाइयों का अद्भुत संगम बन गया। कार्यक्रम में मां के विराट स्वरूप, उसकी ममता, त्याग, संस्कार और जीवन में उसकी सार्वभौमिक उपस्थिति पर विद्वानों, साहित्यकारों और कवियों ने अपने विचार रखे। गीत, गजल, कविता और दोहों की भावधारा में मां की स्मृतियां पूरे आयोजन में जीवंत होती रहीं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं डॉ. पूनम सिन्हा ने कहा कि मां की शक्ति और संस्कृति संतान के संस्कारों में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि कवि एवं साहित्यकार संजय पंकज की चर्चित काव्यकृति “मां है शब्दातीत” मां के विराट और अवर्णनीय स्वरूप को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उजागर करती है। चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद मुख्य अतिथि डॉ. रामप्रवेश सिंह ने कहा कि मां की ममता अतुलनीय होती है। मां कभी मरती नहीं, बल्कि अपनी संतानों में निरंतर विस्तृत होती रहती है। उन्होंने कहा कि करुणा, ममता, दया और क्षमा जैसे मानवीय गुणों से मां संतान के जीवन को समृद्ध बनाती है। उन्होंने यह भी कहा कि संजय पंकज की मां प्रतिभा सिन्हा विदुषी थीं और उनकी साहित्यिक विभूता का प्रभाव पंकज जी के लेखन में स्पष्ट दिखाई देता है। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनिता सिंह ने कहा कि मां अनुभव, अनुभूति और ज्ञान का अथाह कोष होती है। वहीं प्राचार्य डॉ. अमिता शर्मा ने कहा कि मां भले ही सदेह उपस्थित न हो, लेकिन भाव और स्नेह में वह हमेशा जीवित रहती है।

अपने भावपूर्ण उद्गार में साहित्यकार संजय पंकज ने कहा कि हमारी सांस, धड़कन और दृष्टि में मां ही बसती है। साहित्य का संस्कार उन्हें अपनी मां से मिला। उन्होंने कहा कि धैर्य, साहस, विश्वास और दृढ़ संकल्प के रूप में मां सतत संतानों में विस्तृत होती रहती है। “मां की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, सचमुच मां शब्दातीत होती है,” यह कहते हुए वे भावुक हो उठे।

डॉ. रामेश्वर द्विवेदी ने कहा कि मां की सकारात्मक उपस्थिति हमेशा हमारे अच्छे कर्मों में रहती है। सेंट्रल बैंक के अवकाशप्राप्त राजभाषा अधिकारी विमल कुमार परिमल ने कहा कि मां का वास्तविक महत्व तब समझ आता है, जब मां साथ नहीं होती। डॉ. रणवीर राजन ने मां को सृजन और संस्कार का आधार बताया, जबकि डॉ. वंदना विजय लक्ष्मी ने कहा कि मां ईश्वर का साक्षात स्वरूप होती है। डॉ. देवव्रत अकेला ने मां को सार्वभौम बताते हुए कहा कि हमारे भीतर जो भी श्रेष्ठ है, वह मां की ही देन है। इस अवसर पर एच.एल. गुप्ता, डॉ. अशोक शर्मा, अर्चना सिंह, डॉ. कामाख्या नारायण सिंह, डॉ. केशव किशोर कनक, प्रभात कुमार, अनिल कुमार मिश्रा, अमर कुमार, प्रणव चौधरी, ब्रजभूषण शर्मा, चैतन्य चेतन, अनुराग आनंद, विभु कुमारी, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. मीनू नारायण, आग्नेय, पूर्व उपमहापौर विवेक कुमार, अविनाश तिरंगा, प्रेमभूषण एवं सुगंध सहित कई गणमान्य लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। श्रद्धा-संवाद के बाद आयोजित काव्यांजलि कार्यक्रम में कवियों और गीतकारों ने मां पर आधारित रचनाओं से वातावरण को भावुक और आत्मीय बना दिया। कुमार राहुल ने अपने गीत “यादें कड़वी-खट्टी-मीठी...” के माध्यम से जीवन की सच्चाइयों को स्वर दिया। डॉ. राकेश कुमार मिश्र ने “मां के चरणों में सारी सृष्टि है...” सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

प्रवीण कुमार मिश्र, पंकज कर्ण, डॉ. भावना, गोपाल फलक, रंजीत पटेल, श्यामल श्रीवास्तव, सविता राज, सुप्रिया सोनी, हेमा सिंह, लोकनाथ मिश्र, डॉ. मनोज कुमार, रामेश्वर द्विवेदी, संजय पंकज और डॉ. पुष्पा गुप्ता सहित अनेक रचनाकारों ने मां की स्मृति, ममता, संघर्ष और संवेदना को अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से जीवंत कर दिया। कार्यक्रम में गीत, गजल, दोहे और कविताओं की ऐसी भावधारा बही जिसमें मां का स्नेह, त्याग और प्रेम हर श्रोता के भीतर उतरता चला गया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रणवीर राजन ने किया।

आभार व्यक्त करते हुए संजय पंकज ने भावुक स्वर में कहा कि जहां निष्कलुष संबंध, निश्छल प्रेम, पवित्र भाव, नि:स्वार्थ त्याग और नैसर्गिक औदात्य है, वहीं मां है। उन्होंने कहा कि मां के स्मरण और सम्मान में उपस्थित होकर सभी लोगों ने जो स्नेह और सम्मान दिया, वह उनके लिए रचनात्मक संबल और जीवन का सौभाग्य है। “मां की यही तो सार्वभौमिक उपस्थिति है,” इस भावपूर्ण कथन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।