लोकगीतों में जीवंत हुई शाही लीची की विरासत, वैज्ञानिकों को भेंट की गई 'लीचीया लाले लाल' पुस्तक
- Post By Admin on Jul 16 2026
मुजफ्फरपुर : राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर में गुरुवार को आयोजित मासिक किसान–वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम के दौरान कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने केंद्र के निदेशक डॉ. बिकाश दास को अपनी पुस्तक 'लीचीया लाले लाल' भेंट की। यह पुस्तक मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची, लोक संस्कृति और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत को समर्पित लोकगीतों का संग्रह है।
इस अवसर पर सुनील कुमार ने कहा कि शाही लीची की मिठास और "मीठा मुस्कुराने" के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से इस लोकगीत संग्रह का प्रकाशन किया गया है। उन्होंने बताया कि लोकगीत किसी भी क्षेत्र की आत्मा होते हैं, जो वहां के जनजीवन, खुशियों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित और आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि लोक संगीत और लोकगीत समाज की स्मृतियों को संजोने और लोगों को आपस में जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। यही कारण है कि लोकगीत कभी समाप्त नहीं होते, बल्कि समय के साथ नई पीढ़ियों तक हस्तांतरित होते रहते हैं। इनमें जीवन की सहजता, सरलता और लोकजीवन की वास्तविक झलक देखने को मिलती है।
सुनील कुमार ने कहा कि मुजफ्फरपुर केवल अपनी शाही लीची की मिठास के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध कला, संस्कृति और सृजनात्मक परंपराओं के लिए भी देशभर में पहचान रखता है। 'लीचीया लाले लाल' लोकगीत संग्रह में शाही लीची और मुजफ्फरपुर की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित कई लोकगीत शामिल किए गए हैं, जिनमें 'सुन्दर शुभूमि भईया मुजफ्फरपुर के मिटिया से', 'जहाँ होखे लाल-लाल लीचीया', 'स्वागत में लीची', 'लीचीया लाले लाल', 'मुजफ्फरपुर के लीचीया हो भईया', 'झूमे लाल-लाल लीचीया', 'लाल-लाल मुजफ्फरपुर' और 'जाइछी शहर मुजफ्फरपुर' जैसे गीत प्रमुख हैं।
कार्यक्रम में मौजूद किसानों और वैज्ञानिकों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रयास स्थानीय पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।