रश्मिरथी सामाजिक समरसता और न्याय का महाकाव्य है: डॉ. संजय पंकज
- Post By Admin on Jul 07 2026
मुजफ्फरपुर: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ के लेखन एवं प्रकाशन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर हनुमान नगर, माड़ीपुर स्थित पार्वती सदन में ‘दिनकर की रश्मिरथी : एक संवाद’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अशोक शर्मा ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में साहित्यकार डॉ. संजय पंकज ने रश्मिरथी के सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुख्य वक्ता डॉ. संजय पंकज ने कहा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर केवल राष्ट्रीय चेतना के कवि नहीं थे, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों के भी प्रखर प्रवक्ता थे। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी ऐसी कालजयी कृति है, जो जाति और सत्ता के पाखंड को चुनौती देते हुए वैश्विक मानवता का संदेश देती है। उन्होंने कहा कि महाभारत के महान योद्धा कर्ण के माध्यम से दिनकर ने यह स्थापित किया कि महानता किसी वंश या कुल की मोहताज नहीं होती। प्रतिभा, परिश्रम और श्रेष्ठ आचरण ही व्यक्ति को महान बनाते हैं। कर्ण का साहस, दानशीलता, मित्रता और कृतज्ञता उसे भारतीय साहित्य का अद्वितीय चरित्र बनाती है। डॉ. पंकज ने कहा कि रश्मिरथी केवल वीरता की गाथा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का सशक्त दस्तावेज है।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, दिल्ली की ओर से पूरे देश में रश्मिरथी पर्व का आयोजन किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी को दिनकर के साहित्य और विचारों से जोड़ा जा सके। डॉ. मनोज कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि दिनकर ने समाज को जोड़ने वाले मूल्यों और व्यक्ति के आंतरिक गुणों को सर्वोच्च स्थान दिया। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि इसमें किसी पात्र को खलनायक नहीं बनाया गया, बल्कि कर्ण को एक विराट चरित्र-नायक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि मुजफ्फरपुर को देश को पहला राष्ट्रपति और राष्ट्रकवि देने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने कहा कि दिनकर ने रश्मिरथी का लेखन और प्रकाशन यहीं से किया था तथा इसके प्रकाशन के 75 वर्ष पूरे होने पर व्यापक स्तर पर संवाद और विमर्श की आवश्यकता है।
प्रो. अरुण कुमार सिंह ने कहा कि दिनकर आज भी देश के सबसे अधिक उद्धृत कवियों में शामिल हैं। उन्होंने याद दिलाया कि दिनकर लंगट सिंह महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे थे। ऐसे में मुजफ्फरपुर का दायित्व है कि वह दिनकर साहित्य को केवल चर्चा तक सीमित न रखे, बल्कि उसे जन-जन तक पहुंचाए। एच. एल. गुप्ता ने कहा कि लोग अक्सर "जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है" जैसी प्रसिद्ध पंक्तियां उद्धृत करते हैं, लेकिन बहुत से लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि ये रश्मिरथी की ही पंक्तियां हैं। कार्यक्रम के दौरान डॉ. संजय पंकज ने रश्मिरथी के कई अंशों का प्रभावशाली पाठ भी किया।
कार्यक्रम के अंत में ऑनेस्ट रिपोर्टर के संपादक प्रेमभूषण ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत राष्ट्रकवि दिनकर का साहित्यिक व्यक्तित्व वैश्विक महत्व का है। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी आज भी बुद्धिजीवियों से लेकर आमजन तक की जुबान पर जीवंत है और उसकी पंक्तियां समाज को निरंतर प्रेरित करती हैं।