उच्च मूल्य वाली फसलों से बदलेगी जनजातीय किसानों की तस्वीर, वैज्ञानिकों ने किया निरीक्षण

  • Post By Admin on Jul 02 2026
उच्च मूल्य वाली फसलों से बदलेगी जनजातीय किसानों की तस्वीर, वैज्ञानिकों ने किया निरीक्षण

लखीसराय : जनजातीय बहुल क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका को सशक्त बनाने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में लखीसराय जिला प्रशासन ने महत्वपूर्ण पहल की है। इसी क्रम में बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) के वैज्ञानिकों की चार सदस्यीय टीम ने गुरुवार को सूर्यगढ़ा एवं चानन प्रखंड के अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों का तकनीकी सर्वेक्षण कर वहां की कृषि संभावनाओं और ग्रामीणों की समस्याओं का विस्तृत अध्ययन किया।

यह सर्वेक्षण जिला पदाधिकारी शैलेन्द्र कुमार के निर्देश पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर को भेजे गए पत्र के आलोक में कराया जा रहा है। इसका उद्देश्य जनजातीय परिवारों की आय में वृद्धि के लिए उच्च मूल्य वाली फल एवं औषधीय-सुगंधित फसलों की खेती को बढ़ावा देना तथा कृषि आधारित आजीविका को मजबूत करना है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय द्वारा गठित चार सदस्यीय विशेषज्ञ टीम ने सूर्यगढ़ा प्रखंड की बरियारपुर पंचायत स्थित दुग्धम गांव पहुंचकर जनजातीय बहुल क्षेत्र का निरीक्षण किया। टीम में क्षेत्रीय निदेशक (कृषि अनुसंधान संस्थान, पटना) डॉ. शिवनाथ दास, वरीय वैज्ञानिक डॉ. प्रभात कुमार (पान अनुसंधान केंद्र, इस्लामपुर), डॉ. एस.एस. सोलंकी (नालंदा महाविद्यालय, नूरसराय) तथा कृषि विज्ञान केंद्र, हलसी के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान सुधीर कुमार शामिल थे।

भ्रमण के दौरान वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों से सीधा संवाद कर उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं की जानकारी ली। स्थानीय ग्रामीण चंदा देवी, भतनी देवी, रामबतिया देवी, गोरिया देवी, महेंद्र कोड़ा सहित अन्य लोगों ने सिंचाई के लिए नलकूप की व्यवस्था, सड़क निर्माण और नियमित बिजली आपूर्ति की मांग रखी। ग्रामीणों ने बताया कि वर्तमान में उनकी आजीविका मुख्य रूप से चिरोटा, तुलसी, हरजोर, रेंचा एवं मसूर की खेती के अलावा सूखी लकड़ी और तेंदूपत्ता की बिक्री पर निर्भर है। क्षेत्र में लगभग 30 एकड़ कृषि योग्य भूमि उपलब्ध है, लेकिन सिंचाई की व्यवस्था केवल वर्षा और स्थानीय जल स्रोत 'चुआ' पर आधारित है। खेती अब भी पारंपरिक हल-बैल के माध्यम से की जाती है। किसानों ने यह भी बताया कि तेंदुआ, भालू, जंगली सूअर और बंदरों जैसे जंगली जानवरों के कारण फसलों को लगातार नुकसान पहुंचता है।

क्षेत्र की भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियों का आकलन करने के बाद वैज्ञानिकों ने किसानों को एप्पल बेर, आम, मिश्रीकंद, कटहल, बेल, कालमेघ, तुलसी और लेमनग्रास जैसी उच्च मूल्य एवं औषधीय फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी। साथ ही अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में बकरी पालन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कृषि तकनीकों, औषधीय एवं बागवानी फसलों तथा पशुपालन को बढ़ावा देकर जनजातीय परिवारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है। जिला प्रशासन ने इस पहल को जनजातीय क्षेत्रों में सतत कृषि विकास और आजीविका सुदृढ़ीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। सर्वेक्षण के दौरान जिला उद्यान पदाधिकारी राजीव रंजन, कृषि विज्ञान केंद्र, हलसी के वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार, सूर्यगढ़ा के प्रखंड विकास पदाधिकारी मंजुल मधुप, प्रखंड कृषि पदाधिकारी, प्रखंड उद्यान पदाधिकारी तथा प्रखंड कल्याण पदाधिकारी भी उपस्थित रहे।