बागमती की मृत धारा पर 8 महीने से सुनवाई, फिर भी समाधान नहीं, जल संसाधन विभाग पर उठे सवाल
- Post By Admin on May 30 2026
मुजफ्फरपुर : उत्तर बिहार की जीवनदायिनी कही जाने वाली बागमती नदी की पुरानी (मृत) धारा को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर दायर शिकायत अब जल संसाधन विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं छात्र राजद के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष अमरेन्द्र कुमार द्वारा दायर इस जनहित शिकायत पर लगभग आठ महीने से अधिक समय से सुनवाई चल रही है, लेकिन अब तक न तो कोई स्पष्ट सर्वेक्षण रिपोर्ट सामने आई है और न ही विभाग यह तय कर पाया है कि बेलवा घाट से मकसूदपुर होते हुए नरकटिया तक फैली पुरानी धारा का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसके पुनर्जीवन की संभावना कितनी है।
शिकायतकर्ता अमरेन्द्र कुमार ने 10 अक्टूबर 2025 को मुख्यमंत्री के समक्ष आवेदन देकर मांग की थी कि मीनापुर प्रखंड के बेलवा घाट से मकसूदपुर होते हुए नरकटिया तक बागमती नदी की पुरानी धारा की गाद सफाई (डीसिल्टिंग) कर उसे पुनर्जीवित किया जाए। आवेदन में कहा गया था कि वर्षों की उपेक्षा के कारण यह धारा गाद, सिल्ट और जलकुंभी से भरकर मृतप्राय हो चुकी है, जिसका सीधा असर बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, भू-जल स्तर और पर्यावरण पर पड़ रहा है। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया था कि मृत धारा के कारण बाढ़ के समय मुख्य धारा पर दबाव बढ़ जाता है, हजारों एकड़ कृषि भूमि प्राकृतिक सिंचाई स्रोत से वंचित हो रही है, भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जलीय जैव विविधता प्रभावित हो रही है तथा कई गांवों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। इसके बावजूद विभाग की ओर से स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से दिए गए जवाबों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 नवंबर 2025 की सुनवाई में जल संसाधन विभाग ने बताया कि बागमती-बूढ़ी गंडक लिंक चैनल योजना के अंतर्गत कार्य चल रहा है, लेकिन बेलवा घाट से मकसूदपुर वाले हिस्से में कार्य कराना उचित नहीं माना गया। हालांकि विभाग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि ऐसा क्यों उचित नहीं है। इसके बाद लोक शिकायत प्राधिकार ने विभाग से विस्तृत अद्यतन प्रतिवेदन मांगा। 17 दिसंबर 2025 की सुनवाई में भी विभाग कोई नया तथ्य प्रस्तुत नहीं कर सका और मामले को अगली तिथि तक स्थगित कर दिया गया। 09 जनवरी 2026 की सुनवाई में विभाग ने दावा किया कि लिंक चैनल परियोजना का 79 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है तथा शेष 12 किलोमीटर में उड़ाही का कार्य बाकी है। विभाग ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई पुरानी धारा के कई हिस्सों पर लोगों ने मिट्टी भरकर खेती शुरू कर दी है तथा कई स्थान रैयती भूमि हैं। हालांकि विभाग यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि यदि यह वास्तव में नदी की पुरानी धारा थी तो उस पर अतिक्रमण कैसे हुआ और उसे हटाने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई।
06 फरवरी 2026 की सुनवाई में विभाग ने पुनः यही तर्क दोहराया कि स्थानीय लोग खेती कर रहे हैं और खुदाई कराने से विवाद उत्पन्न हो सकता है। इसी आधार पर मामले को समाप्त करने का आदेश पारित कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता अमरेन्द्र कुमार ने विभागीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के समक्ष अपील दायर की। 27 मई 2026 को हुई सुनवाई में प्रथम अपीलीय प्राधिकार ने विभाग के प्रतिवेदन का परीक्षण करते हुए पाया कि विभाग ने केवल यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि कुछ लोग खेती कर रहे हैं और भूमि रैयती है। अपीलीय प्राधिकार ने विभाग को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट करे कि संबंधित विषय मूल स्वीकृत प्राक्कलन में शामिल है या नहीं तथा विस्तृत अद्यतन प्रतिवेदन के साथ अगली सुनवाई में उपस्थित हो। मामले की अगली सुनवाई 17 जून 2026 को निर्धारित की गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यदि विभाग स्वयं स्वीकार कर रहा है कि पुरानी बागमती धारा के विभिन्न बिंदुओं का निरीक्षण किया गया, तो फिर अब तक यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि वह क्षेत्र सरकारी अभिलेखों में नदी है, नाला है या निजी भूमि? यदि नदी की पुरानी धारा पर अतिक्रमण हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? और यदि लिंक चैनल परियोजना का उद्देश्य पुरानी धारा को पुनर्जीवित करना है, तो बेलवा घाट से मकसूदपुर और नरकटिया तक के हिस्से को योजना से बाहर क्यों रखा गया?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि विभाग ने अब तक कोई वैज्ञानिक सर्वेक्षण, जल प्रवाह अध्ययन, बाढ़ प्रबंधन अध्ययन या पर्यावरणीय मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की। केवल “विवाद हो जाएगा” कहकर जनहित के इतने बड़े मुद्दे को खारिज करना प्रशासनिक जवाबदेही से बचने का प्रयास माना जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नदी की पुरानी धारा को पुनर्जीवित करने के बजाय विभाग ने अतिक्रमण और खेती को आधार बनाकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता चुना है। लोगों का कहना है कि यदि वर्षों तक नदी क्षेत्र पर कब्जा होता रहा, तो इसके लिए आम जनता नहीं बल्कि प्रशासनिक तंत्र जिम्मेदार है। अब अपीलीय प्राधिकार द्वारा दोबारा सुनवाई तय किए जाने के बाद क्षेत्र के लोगों में फिर उम्मीद जगी है। 17 जून 2026 की सुनवाई पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं। जनता को उम्मीद है कि इस बार विभाग को स्पष्ट जवाब देना होगा कि बागमती की पुरानी धारा को बचाने और पुनर्जीवित करने के लिए उसने अब तक क्या किया और आगे क्या करने जा रहा है। बागमती की मृत होती धारा केवल एक नदी का सवाल नहीं है, बल्कि यह बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पर्यावरण संरक्षण और लाखों लोगों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को प्रशासनिक उदासीनता की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।