मुजफ्फरपुर में फायर सेफ्टी घूसखोरी और भगवान भरोसे, हॉस्पिटल से होटल-मॉल तक खतरे के साये में आम लोगों की जिंदगी

  • Post By Admin on Jun 04 2026
मुजफ्फरपुर में फायर सेफ्टी घूसखोरी और भगवान भरोसे, हॉस्पिटल से होटल-मॉल तक खतरे के साये में आम लोगों की जिंदगी

मुजफ्फरपुर: ब्रह्मपुरा स्थित प्रसाद हॉस्पिटल में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर शहर की फायर सेफ्टी व्यवस्था की पोल खोल दी है। चार मरीजों की दर्दनाक मौत के बाद अब सवाल केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरा मुजफ्फरपुर शहर कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। शहर के बड़े अस्पताल, होटल, मॉल, शोरूम, अपार्टमेंट, बैंक्वेट हॉल और कॉरपोरेट ऑफिसों में फायर सिस्टम की स्थिति क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। अधिकांश भवनों में या तो फायर सिस्टम केवल दिखावे के लिए लगाए गए हैं या फिर वर्षों से उनकी जांच तक नहीं हुई है।

शहर में दर्जनों ऐसे बहुमंजिला भवन हैं जहां हर दिन हजारों लोग आते-जाते हैं, लेकिन आग लगने की स्थिति में वहां से सुरक्षित निकासी की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। कई निजी अस्पतालों में फायर हाइड्रेंट सिस्टम काम नहीं करते, अग्निशमन यंत्र एक्सपायर हो चुके हैं और इमरजेंसी एग्जिट तक अवरुद्ध पड़े रहते हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति होती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे भवनों को फायर एनओसी कैसे मिल जाती है? शहर में चर्चा आम है कि फायर सिस्टम अप्रूवल अब सुरक्षा का नहीं बल्कि “सेटिंग” का विषय बन चुका है। आरोप लगते रहे हैं कि चंद घूस के पैसों में फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र जारी हो जाते हैं और उसके बाद वर्षों तक कोई निरीक्षण नहीं होता। जिन इमारतों में लोगों की जान सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहां सुरक्षा व्यवस्था खुद असुरक्षित बनी हुई है।

हैरानी की बात यह भी है कि इस गंभीर विषय पर न जिला प्रशासन की लगातार निगरानी दिखाई देती है और न ही जनप्रतिनिधियों की गंभीरता। हर बड़े हादसे के बाद जांच, कार्रवाई और सख्ती की बातें जरूर होती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सबकुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाता है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? प्रशासन, जनप्रतिनिधि, सिस्टम या फिर वह सरकार जो सुरक्षा मानकों के पालन को सुनिश्चित नहीं कर पा रही?

फायर सेफ्टी की अनदेखी अब केवल लापरवाही नहीं बल्कि संभावित मौतों को खुला निमंत्रण बन चुकी है। शहर में अधिकांश लोग ऐसे भवनों में रोजाना जाते हैं जहां किसी बड़े हादसे की स्थिति में बच निकलना मुश्किल हो सकता है। लेकिन अफसोस यह है कि आम जनता की जिंदगी और सुरक्षा शायद सिस्टम की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सभी व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों का निष्पक्ष फायर ऑडिट नहीं कराया गया, तो आने वाले दिनों में मुजफ्फरपुर किसी और बड़े हादसे का गवाह बन सकता है। सवाल अब भी वही है—क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि अगली मौतों का इंतजार कर रहा है?

आज की घटना पर शहर के विधायक रंजन कुमार ने अन्य हॉस्पिटल की जांच की बात कही लेकिन क्या यह हो पाएगा और हॉस्पिटल की ही जांच क्यों ? हर जगह की जांच क्यों नहीं ? फायर सेफ्टी एनओसी के नाम पर हो रही घूसखोरी पर वो लगाम लगा पाएंगे ? शहर के हॉस्पिटल, होटल, मॉल समेत अन्य सभी व्यावसायिक स्थलों की जांच करा पाएंगे ? और यदि इसका जवाब नहीं है तो यह चिंता की विषय जरूर है और जवाब हां है तो फिर कब तक ? सवाल अब भी बरकरार है... कि जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सरकार अगली मौतों का इंतजार कर रही है ?