विश्व न्याय दिवस पर कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन पर जोर, अधिवक्ता रजनीश कुमार ने रखे विचार

  • Post By Admin on Jul 17 2026
विश्व न्याय दिवस पर कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन पर जोर, अधिवक्ता रजनीश कुमार ने रखे विचार

लखीसराय : विश्व अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस के अवसर पर व्यवहार न्यायालय, लखीसराय के अधिवक्ता रजनीश कुमार ने न्याय व्यवस्था, विधि के शासन और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य जनता की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की रक्षा करना है, न कि सत्ता के अहंकार को वैधता प्रदान करना। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है और राज्य की प्रत्येक संस्था जनता के प्रति जवाबदेह है। ऐसे में कानून का उपयोग नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें भयभीत करने के लिए।

अधिवक्ता रजनीश कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में कानून के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। झूठे मुकदमे, पक्षपातपूर्ण अनुसंधान, अनावश्यक गिरफ्तारियां और न्याय मिलने में देरी जैसी परिस्थितियां आम नागरिक के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने कहा कि यदि कानून कमजोर की रक्षा करने के बजाय केवल शक्तिशाली का संरक्षण करता हुआ प्रतीत हो, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने न्यायपालिका की निष्पक्षता को लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता को निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। जब निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता है और प्रभावशाली लोग व्यवस्था को प्रभावित करते नजर आते हैं, तब लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है।

रजनीश कुमार ने कहा कि यह चुनौती केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में भी राज्य की शक्ति और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में संविधान, विधि का शासन और मानवाधिकार शासन व्यवस्था की वास्तविक कसौटी बनने चाहिए। उन्होंने विश्व अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस पर सभी से यह संकल्प लेने का आह्वान किया कि कानून किसी सरकार, दल, व्यक्ति या अधिकारी का नहीं, बल्कि संविधान का प्रहरी बना रहे। उन्होंने कहा कि न्यायालयों की गरिमा, अधिवक्ताओं की निर्भीकता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा ही लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है। अंत में उन्होंने कहा कि न्याय केवल न्यायालय के निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़ा होना भी न्याय का महत्वपूर्ण स्वरूप है। यदि कानून नागरिकों की अपेक्षित सुरक्षा प्रदान नहीं कर पा रहा है, तो कानून से अधिक उसके प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा आवश्यक है।