एचबीएनसी योजना से नवजात को सुरक्षा कवच, आशाएं कर रहीं निगरानी
- Post By Admin on May 06 2026
लखीसराय : जिले में नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने विशेष जोर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार जन्म के बाद शुरुआती 42 दिन शिशु के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, जिनमें पहले 28 दिन सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। इस दौरान उचित देखभाल नहीं होने पर शिशु मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित गृह आधारित नवजात देखभाल कार्यक्रम (एचबीएनसी) के तहत आशा कार्यकर्ता संस्थागत और गृह प्रसव दोनों स्थितियों में नवजात की देखभाल के लिए 42 दिनों तक घर-घर जाकर निगरानी करती हैं। संस्थागत प्रसव में जहां माँ और शिशु को शुरुआती दो दिन अस्पताल में देखभाल मिलती है, वहीं गृह प्रसव के मामलों में पहले दिन से ही विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
जिला सिविल सर्जन डॉ. जयप्रकाश सिंह ने बताया कि नवजात देखभाल सप्ताह के दौरान आशाओं को विशेष रूप से सक्रिय किया गया है। उन्हें निर्देश दिया गया है कि गृह भ्रमण के दौरान नवजात में किसी भी तरह की समस्या की पहचान कर समय पर इलाज के लिए रेफर करें। जिला कार्यक्रम प्रबंधक सुधांशु नारायण लाल ने बताया कि एचबीएनसी कार्यक्रम के तहत आशा कार्यकर्ता न केवल नवजात के स्वास्थ्य की निगरानी करती हैं, बल्कि माताओं को शिशु देखभाल के बारे में आवश्यक जानकारी भी देती हैं। संस्थागत प्रसव के मामलों में 3, 7, 14, 21, 28 और 42वें दिन कुल 6 बार भ्रमण किया जाता है, जबकि गृह प्रसव में 1, 3, 7, 14, 21, 28 और 42वें दिन कुल 7 बार घर जाकर देखभाल की जाती है।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशुओं को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले बच्चों की पहचान कर उनकी विशेष देखभाल करना तथा किसी भी बीमारी के लक्षण दिखने पर समय पर उपचार सुनिश्चित करना है। साथ ही परिवारों को सही स्वास्थ्य व्यवहार अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से अपील की है कि नवजात में किसी भी तरह के खतरे के संकेतों को नजरअंदाज न करें। यदि शिशु को सांस लेने में परेशानी हो, स्तनपान न कर पा रहा हो, शरीर का तापमान असामान्य हो, शिशु अत्यधिक सुस्त हो जाए या उसकी गतिविधियों में कमी आए, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में संपर्क करें। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पहचान और उपचार से नवजात की जान बचाई जा सकती है।