POCSO मामलों में 'चेस्ट' और 'ब्रेस्ट' का अंतर नहीं, यौन मंशा से छूना अपराध : हाई कोर्ट

  • Post By Admin on Jul 22 2026
POCSO मामलों में 'चेस्ट' और 'ब्रेस्ट' का अंतर नहीं, यौन मंशा से छूना अपराध : हाई कोर्ट

कोच्चि : बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में केरल हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत 'चेस्ट' (छाती) और 'ब्रेस्ट' (स्तन) के बीच अंतर करना कानूनी रूप से प्रासंगिक नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि किसी बच्चे की छाती को यौन मंशा से छुआ या पकड़ा जाता है, तो उसे यौन उत्पीड़न ही माना जाएगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ ने कोझिकोड के 12 वर्षीय बच्चे से जुड़े एक यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई के दौरान की। मामले में आरोपी पर आरोप था कि उसने बच्चे को पीछे से पकड़कर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया।

सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से दलील दी गई कि किसी बच्चे की 'चेस्ट' को छूना या पकड़ना पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता और केवल 'ब्रेस्ट' को यौन मंशा से छूना ही अपराध की श्रेणी में आता है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि चिकित्सकीय दृष्टि से दोनों शब्दों के अलग अर्थ हो सकते हैं, लेकिन यौन उत्पीड़न के मामलों में इनका ऐसा अंतर स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि किसी बच्चे की छाती को यौन उद्देश्य से छुआ जाता है, तो वह पॉक्सो कानून के तहत यौन उत्पीड़न का अपराध है।

हाई कोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद आरोपी की सजा से संबंधित धाराओं में संशोधन भी किया। इससे पहले मंजेरी की विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपी को गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, जिसमें न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान है। हालांकि, हाई कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर मामले को 'गंभीर यौन उत्पीड़न' के बजाय पॉक्सो अधिनियम के तहत 'यौन उत्पीड़न' की श्रेणी में माना। इस अपराध के लिए तीन से पांच वर्ष तक के कठोर कारावास का प्रावधान है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि पीड़ित यह आरोप लगाता है कि आरोपी ने उसकी छाती को यौन मंशा से पकड़ा या छुआ, तो यह स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आएगा और कानून इसकी अलग व्याख्या की अनुमति नहीं देता।