लोक जीवन और जनसंवेदना के सशक्त कवि थे महाकवि राकेश : डॉ. संजय पंकज
- Post By Admin on Jul 14 2026
मुजफ्फरपुर: आमगोला स्थित शुभानंदी सभागार में महाकवि राकेश स्मृति समिति और नवसंचेतन के संयुक्त तत्वावधान में उत्तर छायावाद के अग्रणी कवि महाकवि राम इकबाल सिंह 'राकेश' की जयंती पर स्मृति पर्व का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और कवियों ने महाकवि राकेश के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें लोक जीवन, जनसंवेदना और भारतीय संस्कृति का सशक्त हस्ताक्षर बताया।
कार्यक्रम के विषय प्रवर्तक डॉ. संजय पंकज ने कहा कि महाकवि राकेश ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति, लोक आस्था, जनजीवन और सामाजिक सरोकारों को प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी। उनकी कविताओं में शौर्य, स्वाभिमान, विद्रोह, प्रकृति, लोक संस्कृति और जीवन सत्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि राकेश की रचनाओं में गांव की मिट्टी, प्रकृति और लोकजीवन का सौंदर्य पूरी संवेदनशीलता के साथ उभरकर सामने आता है। उन्होंने बताया कि 'चट्टान', 'गांडीव', 'मेघ दुंदुभी', 'गंध ज्वार' और 'पद्मरागा' जैसे काव्य संग्रह उनकी रचनात्मक ऊंचाइयों के प्रमाण हैं। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. ब्रजभूषण मिश्र ने कहा कि महाकवि राकेश कृषि संस्कृति और किसान जीवन के संवेदनशील रचनाकार थे। उनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन, खेती-किसानी और श्रमशील समाज की गहरी छाप दिखाई देती है।
डॉ. विजय शंकर मिश्र ने कहा कि राकेश की रचनाओं में जीवन, समाज, प्रकृति और समय के विविध रंग समाहित हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लमही ने प्रेमचंद को जन्म दिया, उसी प्रकार भदई की मिट्टी ने महाकवि राम इकबाल सिंह 'राकेश' जैसे साहित्यकार को जन्म दिया, जिनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी। कार्यक्रम की शुरुआत महाकवि राकेश के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इस अवसर पर उनके जामाता ब्रजभूषण शर्मा ने उनके साथ बिताए संस्मरण साझा करते हुए बताया कि राकेश नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने के पक्षधर थे। समाजसेवी एच.एल. गुप्ता ने उन्हें सरल, निर्भीक और लोक के प्रति समर्पित साहित्यकार बताया।
महाकवि राकेश पर शोध कर चुके डॉ. केशव किशोर कनक ने कहा कि उनकी कविताओं में मानवतावादी दृष्टिकोण और लोकमंगल की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वहीं कवयित्री सविता राज ने कहा कि उनकी रचनाएं भाषा, संवेदना और अभिव्यक्ति की दृष्टि से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। कार्यक्रम में मधुमंगल ठाकुर, प्रेमभूषण, प्रवीण कुमार मिश्र, प्रमोद आजाद, विभु कुमारी, सत्या कुमारी, राकेश कुमार सिंह, माला कुमारी, चैतन्य चेतन और अनुराग आनंद सहित कई साहित्यकारों ने भी अपने विचार रखे।
दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता डॉ. विजय शंकर मिश्र ने की। इस दौरान उन्होंने अपनी कविता "मां का मतलब पूछ रहे हो, मां तो केवल मां होती है..." का भावपूर्ण पाठ किया। प्रवीण कुमार मिश्र, सविता राज, डॉ. संजय पंकज, डॉ. केशव किशोर कनक, राहुल कुमार, यशवंत और प्रणव चौधरी सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन सुकृति सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रमोद आजाद एवं कवि गोष्ठी के समापन पर चैतन्य चेतन ने किया। आयोजन में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।