मुखिया की सीटों के आरक्षण पर हाईकोर्ट की मुहर, धारा 15(5) के तहत तय होगा आरक्षण
- Post By Admin on Aug 25 2026
पटना : बिहार में अगले साल प्रस्तावित पंचायत चुनाव से पहले पटना हाईकोर्ट ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) को आधार बनाया जाएगा। इसके लिए 1991 के बिहार आरक्षण कानून को सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने सहरसा जिले की ग्राम पंचायत राज सहुरिया के मुखिया मो. ईसा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरियों में लागू आरक्षण और पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण का कानूनी आधार एक जैसा नहीं है। मामला मो. ईसा को मुखिया पद से हटाए जाने से जुड़ा था। जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग ने उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया था। इस कार्रवाई को मो. ईसा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के बाद अदालत ने निर्वाचन आयोग के आदेश को रद्द करने के साथ ही जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट को भी निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपने 31 पन्नों के फैसले में 1991 के बिहार आरक्षण कानून की भूमिका को भी स्पष्ट किया। कोर्ट के मुताबिक यह कानून मुख्य रूप से राज्य सरकार की नौकरियों और सरकारी सेवाओं में आरक्षण से संबंधित है। इसलिए पंचायत चुनाव में किसी सीट को आरक्षित करने के लिए इस कानून को सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, पिछड़े वर्ग में शामिल जातियों की पहचान के लिए 1991 के कानून का संदर्भ लिया जा सकता है। लेकिन पंचायत चुनाव में किसी सीट को किस वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा, इसके लिए बिहार पंचायत राज अधिनियम में निर्धारित प्रावधान ही लागू होंगे।
हाईकोर्ट के इस फैसले से पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर चल रहे विवादों को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। खास तौर पर मुखिया पद की सीटों के आरक्षण से जुड़े मामलों में अब बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) को प्रमुख आधार माना जाएगा। कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी नौकरी और पंचायत चुनाव में आरक्षण के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।