उर्दू को नजरअंदाज करना अन्याय, सरकार की नीति पर मुशावरत ने उठाए सवाल
- Post By Admin on May 07 2026
पटना : बिहार सरकार की “सात निश्चय-3” योजना के तहत राज्य के 208 प्रखंडों में नए डिग्री महाविद्यालय खोलने तथा 16 विषयों में 6656 शिक्षकों की नियुक्ति की घोषणा में उर्दू विषय को शामिल नहीं किए जाने पर उर्दू भाषी समाज में गहरी नाराजगी देखी जा रही है।
ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत बिहार के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. सैयद अबूज़र कमालुद्दीन और प्रदेश महासचिव मोहम्मद इश्तेयाक ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि बिहार में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक उर्दू की समुचित व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी है। दोनों नेताओं ने कहा कि नए महाविद्यालयों के लिए जारी विषयों की सूची में उर्दू को शामिल नहीं करना भाषा और उर्दू भाषी समाज के साथ अन्याय है। उनका कहना था कि यदि उर्दू विषय शामिल नहीं होगा तो उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति भी नहीं हो सकेगी और विद्यार्थियों को उर्दू में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा। इससे राज्य में उर्दू के शैक्षणिक वातावरण को गंभीर क्षति पहुंचेगी। मुशावरत के नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार के इस निर्णय से उसकी नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उर्दू शिक्षा को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
प्रोफेसर डॉ. अबूज़र कमालुद्दीन ने शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी के उस बयान का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा कि वर्तमान निर्णय उस दावे के विपरीत दिखाई देता है और इससे कथनी और करनी का अंतर स्पष्ट होता है। प्रदेश महासचिव मोहम्मद इश्तेयाक ने राज्य की सभी मिल्ली, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और उर्दू संगठनों से एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सभी संगठनों को मिलकर एक प्रतिनिधिमंडल बनाना चाहिए, जो राज्यपाल, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर अधिसूचना में संशोधन कर उर्दू विषय को शामिल करने की मांग करे।
संयुक्त बयान में कहा गया कि समय रहते इस दिशा में पहल करना जरूरी है। आवश्यकता पड़ने पर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध-प्रदर्शन का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। नेताओं ने उम्मीद जताई कि राज्य के सभी जिलों में जिम्मेदार लोग आगे आकर उर्दू भाषा के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे, ताकि बिहार में उर्दू का भविष्य सुरक्षित रह सके।