मुजफ्फरपुर शहर में हरियाली घटने का असर : सांस और जल संकट की दोहरी मार झेल रहे शहरवासी

  • Post By Admin on Feb 19 2026
मुजफ्फरपुर शहर में हरियाली घटने का असर : सांस और जल संकट की दोहरी मार झेल रहे शहरवासी

मुजफ्फरपुर: जिले में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई अब पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ आम जनजीवन के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में तेजी से घटती हरियाली ने न केवल प्रदूषण के स्तर को बढ़ाया है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, जल संसाधनों और मौसम चक्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।

कभी हरियाली से पहचाने जाने वाले शहर के कई इलाके आज वृक्ष विहीन होते जा रहे हैं। कंपनीबाग, कलमबाग रोड और लेप्रोसी मिशन जैसी सड़कें, जो कभी घने वृक्षों की छाया में ढकी रहती थीं, अब विरान और धूप से झुलसी दिखाई देती हैं। इन क्षेत्रों में पहले इतने सघन पेड़ थे कि एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच धूप का प्रवेश मुश्किल से हो पाता था। लेकिन हाल के वर्षों में अवैध कटाई, निर्माण कार्यों और शहरी विकास परियोजनाओं के चलते इन इलाकों की हरियाली तेजी से कम हुई है। पेड़ों की कमी का असर अब स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है। शहर में वायु प्रदूषण के स्तर में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों और एलर्जी की शिकायतें बढ़ रही हैं। चिकित्सकों के अनुसार स्वच्छ हवा की कमी, धूल और धुएं का बढ़ता प्रभाव श्वसन तंत्र पर नकारात्मक असर डाल रहा है। बुजुर्गों, बच्चों और अस्थमा रोगियों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक मानी जा रही है। पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत केवल वायु गुणवत्ता तक सीमित नहीं हैं। हल्की गर्मी की शुरुआत के साथ ही कई इलाकों में भूजल स्तर गिरने की शिकायतें सामने आने लगी हैं। कम गहराई पर लगे चापाकल और हैंडपंप जवाब देने लगे हैं, जिससे पेयजल संकट की स्थिति बनने लगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि वृक्षों की कमी का सीधा संबंध जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण से है। पेड़ वर्षा जल को धरती में समाहित करने में सहायक होते हैं, जबकि उनकी अनुपस्थिति में जल तेजी से बहकर नष्ट हो जाता है।

नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे के किनारे लगे वृक्षों के भी धीरे-धीरे गायब होने की बात सामने आ रही है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार लकड़ी माफिया पेड़ों को चरणबद्ध तरीके से नुकसान पहुंचाते हैं। पहले पेड़ों की जड़ों या तनों को आंशिक रूप से काटा जाता है, जिससे वे धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। बाद में रात के अंधेरे में इन्हें पूरी तरह काट लिया जाता है। इस प्रकार की अवैध गतिविधियों ने हरित पट्टी को गंभीर क्षति पहुंचाई है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़ों की निरंतर कटाई से तापमान में वृद्धि, वर्षा चक्र में अनियमितता और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पक्षियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे उनका अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो प्रदूषण, जल संकट और असंतुलित मौसम जैसी समस्याएं और विकराल रूप ले सकती हैं। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से अवैध कटाई पर सख्त कार्रवाई, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान और लगाए गए पौधों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की अपील की है। साथ ही आम नागरिकों से भी पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आग्रह किया गया है। उनका कहना है कि वनों और वृक्षों का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।

पर्यावरणविदों के अनुसार, हरित आवरण की रक्षा ही स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल स्रोत और संतुलित मौसम की गारंटी है। यदि वृक्षों की कटाई यूं ही जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जीवन के साथ-साथ प्रकृति का संतुलन भी गंभीर संकट में पड़ जाएगा।