जनगणना बनाम शिक्षा विभाग: आदेश, अधिकार और शिक्षकों की दुविधा

  • Post By Admin on May 16 2026
जनगणना बनाम शिक्षा विभाग: आदेश, अधिकार और शिक्षकों की दुविधा

बिहार में चल रहे जनगणना कार्य के बीच शिक्षकों की स्थिति इस समय अत्यंत दुविधापूर्ण और संवेदनशील बनी हुई है। एक ओर शिक्षा विभाग के अधिकारी विद्यालय संचालन को प्राथमिकता देते हुए शिक्षकों को विद्यालय लौटने एवं विद्यालय कार्य अवधि में विद्यालय में कार्य करने का संकेत दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनगणना कार्य में नियुक्त शिक्षक अभी भी चार्ज अधिकारी सह प्रखंड विकास पदाधिकारी के अधीन कार्य कर रहे हैं जिनके आदेशानुसार शिक्षक 31may तक विद्यालय से बाहर रह कर कार्य करेगें।ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि वे आखिर किस आदेश का पालन करें - शिक्षा विभाग का या जनगणना निदेशालय का?

वर्तमान परिस्थिति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि जनगणना कार्य में प्रगणक एवं पर्यवेक्षक के रूप में शिक्षकों की नियुक्ति चार्ज अधिकारी सह प्रखंड विकास पदाधिकारी के हस्ताक्षर से हुई है। अर्थात शिक्षकों की यह भूमिका शिक्षा विभाग द्वारा नहीं बल्कि जनगणना प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित की गई है। जब किसी शिक्षक को विधिवत आदेश जारी कर जनगणना कार्य में लगाया गया है और वह 31 मई तक उस कार्य के अधीन है, तब स्वाभाविक रूप से जनगणना निदेशालय एवं चार्ज अधिकारी की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि शिक्षा विभाग यह निर्देश देता है कि शिक्षक विद्यालय अवधि में विद्यालय लौटें, तब ऐसी स्थिति में चार्ज अधिकारी को भी अपने स्तर से नया आदेश जारी करना चाहिए। क्योंकि जब तक चार्ज अधिकारी का पूर्व आदेश प्रभावी है, तब तक शिक्षक स्वयं अपने स्तर से यह निर्णय नहीं ले सकते कि वे जनगणना कार्य छोड़कर विद्यालय लौट जाएं और उनके आदेश की अवहेलना करें। प्रशासनिक व्यवस्था में आदेश की निरंतरता और वैधानिकता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

यह भी विचारणीय विषय है कि यदि शिक्षक केवल शिक्षा विभाग के आदेश का हवाला देकर जनगणना कार्य से हटने लगेंगे, तब भविष्य में वे इसी तर्क के आधार पर किसी भी समय जनगणना कार्य करने से मना कर सकते हैं कि वे केवल अपने मूल विभाग के आदेश का पालन करेंगे। ऐसी स्थिति में चार्ज अधिकारी एवं जनगणना प्रशासन की उपयोगिता लगभग समाप्त हो जाएगी। यह न केवल प्रशासनिक समन्वय को प्रभावित करेगा बल्कि भविष्य के सरकारी अभियानों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। वर्तमान विवाद केवल कार्य विभाजन का नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकार और समन्वय का भी प्रतीक बन गया है। शिक्षा विभाग और जनगणना निदेशालय के बीच यदि स्पष्ट संवाद और संयुक्त आदेश नहीं आता है, तो इसका सीधा प्रभाव शिक्षकों की मानसिक स्थिति और कार्य क्षमता पर पड़ेगा। शिक्षक पहले ही दोहरे कार्यभार और प्रशासनिक दबाव के बीच कार्य कर रहे हैं। ऐसे में अस्पष्ट आदेश उन्हें और अधिक असमंजस तथा तनाव की स्थिति में डाल सकता है।

इस परिस्थिति में शिक्षकों के लिए सबसे संतुलित और व्यावहारिक रास्ता यही प्रतीत होता है कि वे उस प्राधिकार के स्पष्ट निर्देश की प्रतीक्षा करें जिसके हस्ताक्षर से उन्हें जनगणना कार्य में लगाया गया है। प्रशासनिक स्तर पर भी आवश्यक है कि शिक्षा विभाग और जनगणना निदेशालय आपसी समन्वय स्थापित कर एक संयुक्त एवं स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें ताकि शिक्षकों को भ्रम और अनिश्चितता से मुक्ति मिल सके। समय यह तय करेगा कि इस प्रशासनिक वर्चस्व की लड़ाई में किस पक्ष की व्यवस्था प्रभावी सिद्ध होती है, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षकों के हित, मानसिक संतुलन और प्रशासनिक स्पष्टता को प्राथमिकता देने की है।

शशि सिद्धेश्वर कुमार "गुलाब" शिक्षक नेता, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता।

*तस्वीर केवल सांकेतिक है...