भूदाता की पहचान मिटाने पर भूमि वापसी का अधिकार, राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक भेजा गया ज्ञापन

  • Post By Admin on Jan 27 2026
भूदाता की पहचान मिटाने पर भूमि वापसी का अधिकार, राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक भेजा गया ज्ञापन

मुजफ्फरपुर: पूर्वजों द्वारा जनहित में प्रदत्त भूमियों के उद्देश्यपूर्ति न होने और भूदाताओं की पहचान समाप्त किए जाने के मुद्दे को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रेस विज्ञप्ति सामने आई है। सामाजिक प्रतिनिधि एवं “ऑक्सीजन बाबा” के नाम से चर्चित डॉ. अविनाश तिरंगा की ओर से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और बिहार के राज्यपाल को संयुक्त संवैधानिक ज्ञापन भेजा गया है। इस ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि यदि दान की गई भूमि का उपयोग मूल उद्देश्य के विपरीत किया जाता है या भूदाता की पहचान जानबूझकर मिटाई जाती है, तो ऐसी स्थिति में भूमि की वापसी भूदाता के वैध उत्तराधिकारियों का संवैधानिक अधिकार है। यह पहल UGC के नए नियम आने के विरुद्ध की गई है। 

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि सवर्ण समाज के पूर्वजों द्वारा विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, मंदिर, धर्मशाला, मेडिकल कॉलेज और अन्य जनहित संस्थानों के लिए दी गई भूमियां निः शर्त दान नहीं थीं, बल्कि सामाजिक उद्देश्य, नैतिक शर्तों और स्पष्ट अपेक्षाओं के साथ प्रदान की गई थीं। यदि इन शर्तों का उल्लंघन होता है, भूमि का व्यावसायीकरण किया जाता है या राजनीतिक हस्तक्षेप होता है, तो यह न केवल नैतिक अपराध है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का भी गंभीर उल्लंघन है।

ज्ञापन में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300A, भारतीय न्यास अधिनियम और प्रासंगिक भूमि एवं सिविल कानूनों का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऐसी परिस्थितियों में भूमि की वापसी का अधिकार पूरी तरह संरक्षित है। इसमें यह भी मांग की गई है कि जिन संस्थानों की स्थापना किसी भूदाता द्वारा प्रदत्त भूमि पर हुई है, उनका नामकरण अनिवार्य रूप से उसी भूदाता के नाम पर किया जाए, ताकि उनके योगदान और इतिहास को संवैधानिक सम्मान मिल सके।

विशेष रूप से मुजफ्फरपुर स्थित बिहार विश्वविद्यालय का उल्लेख करते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह विश्वविद्यालय भूदाता बाबू लंगट सिंह द्वारा दी गई भूमि पर स्थापित है। इसलिए विश्वविद्यालय का नाम बाबू लंगट सिंह विश्वविद्यालय किए जाने की तत्काल संवैधानिक घोषणा और विधिसम्मत अधिसूचना जारी की जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो संपूर्ण भूमि को भूदाता के वैध उत्तराधिकारियों को तत्काल लौटाए जाने की मांग की गई है।

डॉ. अविनाश तिरंगा ने प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया है कि यह किसी प्रकार की चेतावनी नहीं, बल्कि भूदाताओं के उत्तराधिकारियों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों की औपचारिक उद्घोषणा है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों की पहचान मिटाकर उनकी भूमि पर संस्थान चलाना स्वीकार्य नहीं है और समाज इस विषय पर संवैधानिक दायरे में रहकर संघर्ष करेगा। इस ज्ञापन के सामने आने के बाद शिक्षा जगत और सामाजिक संगठनों में चर्चा तेज हो गई है और अब सरकार के रुख पर सभी की निगाहें टिकी हैं।