एल.एन.टी. कॉलेज में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, शताब्दी विमर्श और अस्मिता पर हुआ गहन मंथन

  • Post By Admin on Jan 27 2026
एल.एन.टी. कॉलेज में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, शताब्दी विमर्श और अस्मिता पर हुआ गहन मंथन

मुजफ्फरपुर: ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय के हिंदी विभाग और अभिधा प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ किया गया। संगोष्ठी का विषय “नामवर सिंह, कृष्णा सोबती एवं श्रीलाल शुक्ल का शताब्दी स्मरण तथा दलित व अस्मिता विमर्श” रखा गया है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रख्यात विद्वानों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों की उपस्थिति में पहले ही दिन साहित्यिक विमर्श का समृद्ध माहौल देखने को मिला।

  • प्रथम सत्र : शताब्दी स्मरण और समकालीन पुनर्मूल्यांकन

संगोष्ठी के प्रथम सत्र का उद्घाटन करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. ममता रानी ने स्वागत भाषण में कहा कि शताब्दी वर्ष पर तीन महान रचनाकारों को याद करना केवल स्मरण नहीं, बल्कि बदलते समय में साहित्य और समाज के पुनर्मूल्यांकन का अवसर है। उन्होंने कहा कि आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने यथार्थ और जीवंत आलोचना के माध्यम से अनेक रचनाकारों को नई पहचान दी और हिंदी आलोचना को नई दिशा प्रदान की। डॉ. ममता रानी ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने साहित्य को समाज, राजनीति और संस्कृति से जोड़कर देखा। प्राचार्य ने कृष्णा सोबती को संवेदनशील कथाकार बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में स्त्री चेतना की गहरी समझ दिखाई देती है। उन्होंने स्त्री जीवन के संघर्ष, आत्मसम्मान और स्वतंत्र चेतना को जिस साहस के साथ अभिव्यक्त किया, वह हिंदी साहित्य के लिए मील का पत्थर है। वहीं श्रीलाल शुक्ल की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी व्यंग्य दृष्टि ने सामाजिक यथार्थ को बेबाकी से उजागर किया। डॉ. ममता रानी ने संगोष्ठी को छात्रों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए विश्वास जताया कि इस आयोजन से साहित्यिक चेतना और आलोचनात्मक दृष्टि को नई ऊर्जा मिलेगी।

उद्घाटन भाषण में प्रख्यात आलोचक प्रो. रविभूषण ने कहा कि नामवर सिंह जैसे गंभीर चिंतक और आलोचक आज के समय में दुर्लभ हो गए हैं। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि अत्यंत संवेदनशील थी और उन्होंने आलोचना के विविध आयामों को सामने लाने का साहस किया। उनके विचारों की गूंज पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सुनाई देती है। वक्ता प्रो. पूनम सिंह ने नामवर सिंह को हिंदी साहित्य का शिखर पुरुष बताते हुए कहा कि उनके विचारों में नव्यता, सरलता और नवीन दृष्टि का समन्वय था। वे साहित्य को शोध और विश्लेषण की दृष्टि से देखने में सक्षम थे। जेएनयू के विद्वान प्रो. देवशंकर नवीन ने कहा कि जैसे मुक्तिबोध का जीवन संघर्षों से भरा रहा, वैसे ही नामवर सिंह का जीवन भी संघर्षों की दंतकथाओं से भरा है। उन्होंने कथालोचना को नई जमीन देने का कार्य किया। वहीं प्रो. तरुण कुमार ने कहा कि नामवर सिंह ऐसे गुरु थे, जिन्होंने शिष्यों के भीतर के ज्ञान को बाहर लाने का कार्य किया और हिंदी के स्वाभिमान के प्रतीक बने।

इसी सत्र के दौरान हिंदी विभाग की पत्रिका ‘संगत’, अभिधा पत्रिका तथा ‘किताब’ (गीतकार नचिकेता पर केंद्रित अंक) का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. सतीश कुमार राय ने कहा कि नामवर सिंह पहले एक सफल आलोचक थे और बाद में व्यक्ति, जिन्होंने आलोचना के फलक को व्यापक बनाया। सत्र का मंच संचालन हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चितरंजन कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संदीप कुमार सिंह ने किया।

  • द्वितीय सत्र : कृष्णा सोबती और श्रीलाल शुक्ल का स्मरण

द्वितीय सत्र का विषय “शताब्दी स्मरण : कृष्णा सोबती एवं श्रीलाल शुक्ल” रहा। इस सत्र में लेखक राकेश रेणु ने कहा कि कृष्णा सोबती की लेखनी हिंदी साहित्य में मील का पत्थर है, जिसने विभाजन और स्त्री विमर्श को नए आयाम दिए। विदुषी वक्ता प्रो. सुनीता गुप्ता ने उन्हें हिंदी की अप्रतिम कथाकार बताते हुए कहा कि उनकी रचनाएं स्त्री के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं और अलग राह रचती हैं। उन्होंने ‘जिंदगीनामा’ और ‘सिक्का बदल गया’ जैसे उपन्यासों के पात्रों पर विस्तार से चर्चा की।

कवि डॉ. संजय पंकज ने कृष्णा सोबती की ‘बादलों के घेरे’, ‘ऐ लड़की’ और ‘लामा’ जैसी कहानियों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। डॉ. अनीशा ने कहा कि कृष्णा सोबती ने स्त्री पीड़ा और विभाजन के दंश को संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए और ‘मेरी मां कहां है’ जैसी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं।श्रीलाल शुक्ल पर चर्चा करते हुए डॉ. रामेश्वर द्विवेदी ने कहा कि उनका व्यंग्य बेहद सादगी से सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है। प्रो. प्रमोद कुमार ने कहा कि ‘राग दरबारी’ सहित उनकी कई रचनाएं समाज को आईना दिखाती हैं, फिर भी हमारे बीच एक दूरी बनी हुई है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे विद्वान प्रो. चन्द्रभानु सिंह ने कहा कि कृष्णा सोबती का व्यक्तित्व निर्भीक था और वे स्त्रीवाद को इंसान के रूप में देखती थीं। इस सत्र का मंच संचालन नीरज मिश्रा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन ज्योति कुमारी ने किया।

संगोष्ठी का यह प्रथम दिवस साहित्यिक विमर्श, शताब्दी स्मरण और अस्मिता के प्रश्नों पर गहन चर्चा के साथ संपन्न हुआ, जबकि दूसरे दिन भी विचारोत्तेजक सत्रों और कवि सम्मेलन के माध्यम से साहित्य प्रेमियों को समृद्ध करने की योजना है।