LNT कॉलेज में राष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा दिन, दलित व स्त्री अस्मिता पर हुआ गहन विमर्श, कवि सम्मेलन ने बांधा समां
- Post By Admin on Jan 28 2026
मुजफ्फरपुर: ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय और अभिधा प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन साहित्यिक और वैचारिक विमर्श की गूंज पूरे परिसर में सुनाई दी। संगोष्ठी के दूसरे दिन दो महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देश के प्रख्यात साहित्यकारों, चिंतकों और शिक्षाविदों ने दलित एवं स्त्री अस्मिता से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर विचार रखे।
कार्यक्रम की शुरुआत में महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. ममता रानी ने सभी आगत अतिथियों का शाल और पुष्प देकर पारंपरिक स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की राष्ट्रीय संगोष्ठियां न केवल साहित्यिक संवाद को समृद्ध करती हैं, बल्कि समाज के भीतर छिपे सवालों पर गंभीर मंथन का अवसर भी प्रदान करती हैं।
- पहला सत्र: दलित अस्मिता, प्रतिरोध और न्याय चेतना
दूसरे दिन के पहले सत्र का विषय “दलित अस्मिता: प्रतिरोध, सम्मान और न्याय चेतना” रहा। इस सत्र में बोलते हुए दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. कर्मानंद आर्या ने कहा कि दलित साहित्य बदले का नहीं, बल्कि बदलाव का साहित्य है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज की आवश्यकता चहुंमुखी विकास की है, जिसके लिए सभी जातियों को प्रतिबद्ध होकर एक साथ कार्य करना होगा।
‘स्त्रीकाल’ पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि जाति हमारे व्यक्तित्व और अस्तित्व दोनों को प्रभावित करती है। जाति भेद केवल संघर्ष के माध्यम से ही समाप्त हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कभी केरल की महिलाओं को अपमानजनक परिस्थितियों में जीना पड़ता था, लेकिन अस्मिता के संघर्ष ने उन्हें आज बेहतर स्थिति तक पहुंचाया है।
दलित लेखक मुसाफिर बैठा ने कहा कि सवर्णों द्वारा किया गया दलित लेखन दलितों की स्वानुभूति का हिस्सा नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि दलित चिंतन के साथ-साथ कर्म क्षेत्र में सक्रिय होना भी अनिवार्य है। कवि और लेखक रमेश ऋतंभर ने कहा कि भारत में विविध संस्कृतियों के बावजूद जाति की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। आज भी पेशे से जाति की पहचान होती है और प्रत्येक जाति अपने से नीचे एक जाति तलाशती है, ताकि उस पर शासन कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि आज भी स्त्री की कोई जाति नहीं मानी जाती। वरिष्ठ लेखक राकेश रेणु ने कहा कि दलित साहित्य में प्रतिरोध, सम्मान और न्याय चेतना का बड़ा अंश निहित है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात आलोचक रवि भूषण ने कहा कि जाति का चयन हमारा अपना नहीं था, बल्कि यह हमें विरासत में मिली व्यवस्था है। आज हमारा जीवन धर्म और जाति से संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य के साथ-साथ दलित राजनीति और दलितों की आर्थिक आज़ादी पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि समाज को बांटने वाली शक्तियां लगातार मजबूत हो रही हैं। इस सत्र का मंच संचालन शिवेंद्र मौर्य ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन रविरंजन द्वारा किया गया।
- दूसरा सत्र: स्त्री अस्मिता, संघर्ष और सरोकार
दूसरे सत्र का विषय “स्त्री अस्मिता: संघर्ष, सपने और सरोकार” रहा। इस सत्र की अध्यक्षता समकालीन पत्रिका के संपादक ऋषिकेश ने की। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. ममता रानी ने स्त्री को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इतिहासकारों ने स्त्रियों के साथ न्याय नहीं किया और उन्हें केवल त्याग, बलिदान और इज्जत की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। इतिहास स्त्री की स्वानुभूति और उसके संघर्ष का समुचित विश्लेषण नहीं कर सका। डॉ. ममता रानी ने कहा कि स्त्री को उसकी अनुभूति के साथ समाज में पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए था, जो अब भी एक बड़ी चुनौती है।
इस सत्र में सुधा निकेतन और पंखुरी सिन्हा ने विविध साहित्यिक उदाहरणों के माध्यम से स्त्री पक्ष को रेखांकित किया। वंदना चौबे ने स्त्री विमर्श की मौलिक अवधारणा को स्पष्ट करते हुए स्त्री श्रम की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक पर पुरुषों का वर्चस्व रहा, जिसके कारण स्त्री हाशिए पर चली गई। निजी संपत्ति के संचय ने भी स्त्री शोषण को बढ़ाया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपनी स्थिति सुधारने के लिए उत्पादन से जुड़ना होगा और समाज को स्त्री श्रम का समुचित मूल्यांकन करना होगा।
पत्रकार एवं कवयित्री निवेदिता झा ने कहा कि स्त्री का बोलना ही विद्रोह का पहला स्वर है। स्त्री अस्मिता को मजबूत करने के लिए समाज को अपनी दृष्टि बदलनी होगी। इस सत्र का मंच संचालन ममता कुमारी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन सोनी कुमारी द्वारा किया गया।
- कवि सम्मेलन के साथ हुआ समापन
संगोष्ठी के समापन अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता निवेदिता झा ने की। कवि सम्मेलन में देवशंकर नवीन, रमेश ऋतंभर, पंखुरी सिन्हा, आस्था दीपाली, आरती, चांदनी समर, सतीश राय, रामेश्वर द्विवेदी, पूनम सिंह और डॉ. ममता रानी सहित कई कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। मंच संचालन डॉ. अनीता सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन अशोक गुप्ता ने किया।
दोनों सत्रों में बड़ी संख्या में गणमान्य अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। संगोष्ठी का दूसरा दिन विचार, विमर्श और कविता के संगम के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।