प्रेमचन्द की संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि आज भी प्रासंगिक : प्रो. कनुप्रिया
- Post By Admin on Jul 31 2026
मुजफ्फरपुर : लंगट सिंह कॉलेज के हिन्दी विभाग द्वारा शुक्रवार को कथासम्राट मुंशी प्रेमचन्द की जयंती के अवसर पर ‘प्रेमचन्द के साहित्य में भारत का स्वरूप और 21वीं सदी का भारत’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार सिंह उपस्थित रहे।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने कहा कि डिजिटल युग में भी प्रेमचन्द का साहित्य अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। उनके द्वारा रचित पात्र और सामाजिक सरोकार आज भी समाज में जीवंत दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी का भारत तभी सशक्त और समावेशी बन सकता है, जब विकास की प्रक्रिया में प्रेमचन्द की संवेदनशीलता, मानवीय करुणा और सामाजिक न्याय के विचारों को स्थान दिया जाए।उन्होंने कहा कि हिन्दी विभाग ऐसे आयोजनों के माध्यम से युवा पीढ़ी को प्रेमचन्द को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित लेखक नहीं, बल्कि समाज और समय के मार्गदर्शक के रूप में समझने के लिए प्रेरित कर रहा है। सच्ची प्रगति तभी संभव है जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय, समानता और अवसर पहुंचें। यही प्रेमचन्द की सबसे बड़ी विरासत है।
मुख्य वक्ता प्रो. प्रमोद कुमार सिंह ने कहा कि प्रेमचन्द केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के सशक्त व्याख्याता हैं। उनके साहित्य में ग्रामीण जीवन, किसानों की समस्याएं, सामाजिक विषमताएं और आमजन की पीड़ा का यथार्थ चित्रण मिलता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत के विकास को सार्थक बनाने के लिए प्रेमचन्द के यथार्थबोध और सामाजिक चेतना को समझना आवश्यक है।
कार्यक्रम का स्वागत एवं समन्वय हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राधा कुमारी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. विजय कुमार ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी अपने विचार रखे तथा प्रेमचन्द के साहित्यिक योगदान पर चर्चा की। इस अवसर पर प्रो. एस.आर. चतुर्वेदी, डॉ. अर्चना ठाकुर, डॉ. शशिकांत पाण्डेय, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. संतोष अनल, डॉ. राजेश अनुपम, डॉ. संध्या कुमारी, डॉ. दीपक कुमार सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।