इतिहास के अनदेखे नायकों पर लंगट सिंह कॉलेज में परिचर्चा, राजकुमार शुक्ल की भूमिका रेखांकित
- Post By Admin on Aug 22 2026
मुजफ्फरपुर : लंगट सिंह कॉलेज के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग की ओर से शनिवार को पुस्तक परिचर्चा एवं व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में “चंपारण में नील संघर्ष के सिपाही (1867-1918)” पुस्तक पर चर्चा के साथ “चंपारण सत्याग्रह में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका” विषय पर व्याख्यान हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने की। वरिष्ठ इतिहासकार भैरव लाल दास मुख्य वक्ता और प्रो. भोजनंदन प्रसाद सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।
प्राचार्या प्रो. कनुप्रिया ने कहा कि चंपारण का नील संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि सत्याग्रह के उस विचार की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पंडित राजकुमार शुक्ल का समर्पण इस बात का उदाहरण है कि बड़े बदलाव की शुरुआत सामान्य जन के प्रयासों से भी हो सकती है।उन्होंने कहा कि इतिहास विभाग शोधपरक आयोजनों के जरिए विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना विकसित करने का प्रयास कर रहा है। युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के उन नायकों के संघर्ष और त्याग से प्रेरणा लेकर उन्हें अपने जीवन मूल्यों में शामिल करना चाहिए।
इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. पुष्पा कुमारी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम केवल पुस्तक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि चंपारण के उन गुमनाम नायकों को याद करने का प्रयास है, जिनके योगदान को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया।
मुख्य वक्ता भैरव लाल दास ने पंडित राजकुमार शुक्ल के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शुक्ल के लगातार प्रयासों के कारण महात्मा गांधी चंपारण पहुंचे और वहां सत्याग्रह के एक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत हुई। उन्होंने कहा कि पंडित शुक्ल की दृढ़ता और प्रतिबद्धता से यह सीख मिलती है कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर निरंतर प्रयास बड़े बदलाव का आधार बन सकता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. भोजनंदन प्रसाद सिंह ने पुस्तक की विषय-वस्तु की सराहना करते हुए कहा कि इसमें चंपारण के नील संघर्ष में सक्रिय रहे अनेक ऐसे लोगों के योगदान को सामने लाया गया है, जिन्हें इतिहास के मुख्य विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी जब इन तथ्यों से परिचित होगी तो उसे स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापकता और सामूहिकता को बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिलेगा।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजीव कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दिलीप कुमार यादव ने किया। मौके पर पीजी इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. रेनू कुमारी, प्रो. एसआर चतुर्वेदी, डॉ. संतोष कुमार अनल, डॉ. धीरेंद्र कुमार, डॉ. आनंद कुमार सिंह समेत अन्य शिक्षक मौजूद रहे।