​चेहरे की हंसी के पीछे छुपे दर्द को पहचानें: राष्ट्रीय परिचर्चा में विशेषज्ञों ने दिया संवेदनशील समाज का संदेश

  • Post By Admin on Oct 15 2026
​चेहरे की हंसी के पीछे छुपे दर्द को पहचानें: राष्ट्रीय परिचर्चा में विशेषज्ञों ने दिया संवेदनशील समाज का संदेश

मुजफ्फरपुर : सामाजिक संस्था 'प्रयत्न' द्वारा “Smiling Outside, Suffering Inside: The Unseen Epidemic of Mental Stress” यानी “बाहर से मुस्कुराते, भीतर से परेशान: मानसिक तनाव की अनदेखी चुनौती” विषय पर एक राष्ट्रीय वेबिनार का सफल आयोजन किया गया। इस वेबिनार का प्रमुख उद्देश्य समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता व जागरूकता बढ़ाना और इससे जुड़े सामाजिक संकोच व पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए आम जन को प्रेरित करना था। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ प्रयत्न के संस्थापक एवं वेबिनार के समन्वयक श्री प्रभात कुमार के स्वागत संबोधन के साथ हुआ। वेबिनार में मुख्य वक्ता के रूप में एमडीडीएम कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर देबस्रुति घोष उपस्थित रहीं, जबकि सत्र की अध्यक्षता इसी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर निशिकांती ने की।

अपने संबोधन में मुख्य वक्ता प्रोफेसर देबस्रुति घोष ने कहा कि बाहर से ठीक और सामान्य दिखना वास्तव में मानसिक रूप से स्वस्थ होने की गारंटी नहीं है। कोई व्यक्ति बाहर से भले ही खुशहाल नजर आए, लेकिन भीतर ही भीतर वह गंभीर तनाव, चिंता और भावनात्मक उलझनों से जूझ रहा हो सकता है। ऐसे में केवल किसी के बाहरी व्यवहार अथवा चेहरे के भावों को देखकर उसकी मानसिक स्थिति का आकलन करना पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज भी अधिकांश लोग अपनी आंतरिक परेशानियों को व्यक्त करने में संकोच करते हैं। समाज में शारीरिक समस्याओं को तुरंत महत्व मिल जाता है क्योंकि वे स्पष्ट दिखाई देती हैं, जबकि मानसिक परेशानियां अदृश्य रह जाती हैं। तनाव को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना अथवा इस पर चुप्पी साधे रखना स्थिति को और अधिक घातक बना देता है। इसके साथ ही, उन्होंने सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग और प्रत्यक्ष संवाद की कमी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल जुड़ाव के बावजूद परिवार, मित्रों और समाज से आमने-सामने बातचीत ही भावनात्मक संबल का सबसे बड़ा साधन है। उन्होंने लोगों से खुलकर अपनी भावनाएं साझा करने, पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखने, आवश्यकता पड़ने पर योग्य विशेषज्ञों से परामर्श लेने की अपील की और देश में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी को एक गंभीर चुनौती करार दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर निशिकांती ने कहा कि मानसिक पीड़ा को समय के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए कि वह खुद खत्म हो जाएगी। उन्होंने सलाह दी कि व्यक्ति को अपनी दिक्कतों के बारे में भरोसेमंद परिजनों, मित्रों या करीबियों से तुरंत बात करनी चाहिए और समय रहते उचित मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। लगभग 55 प्रतिभागियों की सहभागिता वाले इस राष्ट्रीय वेबिनार के समापन पर श्री प्रभात कुमार ने प्रोफेसर देबस्रुति घोष और प्रोफेसर निशिकांती को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया।

कार्यक्रम का औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन सुश्री अलका शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया, जबकि आयोजन को सफल बनाने में शालिनी रंजन, अमित चंद्र चौधरी, विवेक कुमार सिंह तथा रोहित कुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रयत्न संस्था ने रेखांकित किया कि एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज के निर्माण के लिए मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपे दर्द को पहचानना और साझा प्रयास करना अनिवार्य है।