बिहार की धरती से शुरू हुई थी निजी विमानन की ऐतिहासिक कहानी, आसमान में दरभंगा राज की उड़ान की थी ठाठ

  • Post By Admin on Jan 25 2026
बिहार की धरती से शुरू हुई थी निजी विमानन की ऐतिहासिक कहानी, आसमान में दरभंगा राज की उड़ान की थी ठाठ

दरभंगा: उत्तर बिहार के विकास की बात हो और दरभंगा राज का उल्लेख न आए, ऐसा संभव नहीं। भूमि सुधार, शिक्षा, उद्योग और रेलवे के साथ-साथ दरभंगा राज ने एक ऐसा साहसिक कदम भी उठाया था, जो अपने समय से कहीं आगे की सोच का प्रतीक था। यह अध्याय निजी विमानन से जुड़ा है, जिसकी नींव आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में बिहार की धरती पर रखी गई।

देश जब स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण की राह पर आगे बढ़ रहा था, उसी दौर में दरभंगा राज ने आसमान को संभावनाओं का नया क्षेत्र बनाया। यह पहल न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत में निजी विमानन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इतिहासकारों के अनुसार, दरभंगा राज के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह ने वर्ष 1950 में देश की शुरुआती निजी एयरलाइंस में से एक ‘दरभंगा एविएशन’ की स्थापना की। उस समय हवाई यात्रा आम लोगों के लिए सपना हुआ करती थी और निजी एयरलाइन की अवधारणा बेहद सीमित थी। ऐसे में बिहार से उठी यह पहल अपने आप में असाधारण मानी जाती है। दरभंगा एविएशन के बेड़े में उस समय के भरोसेमंद डगलस डीसी-3, जिन्हें डकोटा विमान के नाम से जाना जाता था, शामिल किए गए। ये विमान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सेना से खरीदे गए थे और अपनी मजबूती तथा लंबी दूरी की उड़ानों के लिए प्रसिद्ध थे। शुरुआत में कंपनी के पास कुल चार विमान थे, जिनमें तीन यात्रियों के लिए और एक अत्यंत सुसज्जित महाराजा का निजी विमान था। यह निजी विमान अपने समय का एक लग्ज़री प्रतीक माना जाता था, जिसे आधुनिक भारत का पहला आलीशान विमान भी कहा जाता है।

आज जिस दरभंगा हवाई अड्डे को लोग जानते हैं, उसकी नींव भी महाराजा कामेश्वर सिंह की दूरदृष्टि का परिणाम है। यह हवाई पट्टी मूल रूप से दरभंगा एविएशन के संचालन के लिए विकसित की गई थी। इसके साथ ही पूर्णिया और कूचबिहार में भी हवाई पट्टियां बनवाई गईं, ताकि एक व्यापक विमानन नेटवर्क तैयार किया जा सके। उस दौर में, जब बिहार में सड़क और रेल सुविधाएं भी सीमित थीं, यह सोच बेहद प्रगतिशील मानी जाती है। दरभंगा एविएशन की सबसे महत्वपूर्ण सेवा दरभंगा और कलकत्ता (अब कोलकाता) के बीच नियमित उड़ान थी। इस सेवा ने व्यापार, प्रशासन और सामाजिक संपर्कों को नई गति दी। एयरलाइन की प्रतिष्ठा का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी कई बार महाराजा के विमानों से यात्रा की। जुलाई 1962 में उन्होंने पटना से हैदराबाद की यात्रा के लिए विमान उपलब्ध कराने पर महाराजा को पत्र लिखकर आभार जताया था, जो आज भी इस गौरवशाली अध्याय का सजीव प्रमाण माना जाता है।

हालांकि, दरभंगा एविएशन के इतिहास में दुर्घटनाओं की छाया भी रही। वर्ष 1954 से 1962 के बीच इसके तीन विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए। 1954 में एक विमान कलकत्ता के पास टेक-ऑफ के तुरंत बाद दुर्घटना का शिकार हुआ। 1955 में लीज पर दिया गया एक विमान नेपाल के सिमरा में गिर गया, जबकि 1962 में वीटी-एवाईजी विमान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, वर्तमान बांग्लादेश में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। 1 अक्टूबर 1962 को महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के साथ ही दरभंगा एविएशन का यह अध्याय लगभग समाप्त हो गया। उसी वर्ष भारत-चीन युद्ध के बाद सुरक्षा कारणों से दरभंगा, पूर्णिया और कूचबिहार के हवाई अड्डों को भारत सरकार और भारतीय वायुसेना के अधीन कर दिया गया। महाराजा का निजी लग्ज़री विमान वीटी-सीएमई बाद में भारतीय वायुसेना को सौंपा गया और लंबे समय तक यह भारत के प्रधानमंत्री का आधिकारिक विमान रहा। जवाहरलाल नेहरू से लेकर मोरारजी देसाई तक, कई प्रधानमंत्रियों ने इसी विमान से यात्रा की। आज यह विमान कर्नाटक के बेलगाम में एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा गया है।

आज भी दरभंगा हवाई अड्डा भारतीय वायुसेना के नियंत्रण में है, लेकिन उसका एक हिस्सा उड़ान (UDAN) योजना के तहत नागरिक उड्डयन के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। जब कोई यात्री आज दरभंगा से उड़ान भरता है, तो वह अनजाने में उस विरासत का हिस्सा बन जाता है, जिसकी शुरुआत सात दशक पहले एक दूरदर्शी महाराजा ने बिहार की धरती से की थी।

*खबर में दी गई तस्वीर सांकेतिक है....