परमाणु हथियारों पर से हटा पहरा, वैश्विक सुरक्षा पर बढ़ी चिंता
- Post By Admin on Feb 06 2026
वाशिंगटन : वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से 5 फरवरी 2026 का दिन बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक बन गया है। अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाली आखिरी बड़ी संधि ‘न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी’ (न्यू स्टार्ट) गुरुवार को आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई। इसके साथ ही लगभग 50 वर्षों में पहली बार दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के रणनीतिक हथियारों पर कोई भी कानूनी या बाध्यकारी सीमा नहीं रह गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, न्यू स्टार्ट के खत्म होने से अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलों और रणनीतिक बमवर्षक विमानों जैसे अत्यंत विनाशकारी हथियारों पर नियंत्रण समाप्त हो गया है, जो वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरे की घंटी है।
संधि की अवधि पूरी होते ही रूस ने साफ कर दिया है कि वह अब अमेरिका के साथ परमाणु हथियारों की संख्या सीमित करने वाली किसी भी शर्त से बंधा नहीं है। रूसी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस प्रस्ताव पर अमेरिका की ओर से कोई जवाब नहीं मिला, जिसमें संधि की शर्तों को अगले 12 महीनों तक जारी रखने की बात कही गई थी। मंत्रालय ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने जानबूझकर इस प्रस्ताव को नजरअंदाज किया, इसलिए अब रूस किसी भी दायित्व या पारस्परिक घोषणाओं का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है।
न्यू स्टार्ट संधि की नींव वर्ष 2010 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने रखी थी। इसका उद्देश्य दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों की तैनाती को सीमित करना था। यह संधि 2011 में लागू हुई थी और 2021 में जो बाइडेन प्रशासन ने इसे पांच साल के लिए बढ़ाकर 2026 तक कर दिया था। इससे पहले शीत युद्ध के दौर से ही साल्ट, स्टार्ट-1, स्टार्ट-2 और मॉस्को संधि जैसी कई व्यवस्थाएं परमाणु हथियार नियंत्रण के लिए लागू रही थीं, लेकिन अब यह पूरा ढांचा समाप्त हो चुका है।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने इसे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए “गंभीर क्षण” बताया और चेतावनी दी कि दुनिया पहली बार ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां परमाणु महाशक्तियों पर कोई ठोस लगाम नहीं है। उन्होंने कहा कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का जोखिम दशकों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।
सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अब अमेरिका और रूस दोनों अपने-अपने परमाणु जखीरे में तेजी से इजाफा कर सकते हैं, जिससे चीन समेत अन्य देशों पर भी परमाणु विस्तार का दबाव बढ़ेगा। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों देश अपनी तैनात परमाणु क्षमताओं को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं।
जनवरी 2025 के आंकड़ों के अनुसार, रूस के पास लगभग 4,309 और अमेरिका के पास करीब 3,700 परमाणु वारहेड्स हैं, जो दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का 90 प्रतिशत से अधिक है। संधि के समाप्त होने के बाद अब दोनों देशों के लिए सैकड़ों अतिरिक्त रणनीतिक वारहेड्स तैनात करने का रास्ता खुल गया है।
हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में चीन को शामिल करते हुए किसी नए और व्यापक समझौते पर विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल दुनिया बिना किसी ठोस परमाणु नियंत्रण व्यवस्था के एक नए और अधिक खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुकी है।