211 नए डिग्री कॉलेजों में शिक्षकों की पदस्थापना पर विवाद, वैधानिक प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
- Post By Admin on Aug 10 2026
पटना : बिहार के 211 नए डिग्री महाविद्यालयों में संविदा सहायक प्राध्यापकों के कॉलेजवार आवंटन और पदस्थापना को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में राजभवन सचिवालय द्वारा 1 जुलाई 2026 को जारी अधिसूचना संख्या 1395 से प्रभावी “स्टैच्यूट फॉर अपॉइंटमेंट ऑफ असिस्टेंट प्रोफेसर्स, इन्क्लूडिंग कॉन्ट्रैक्चुअल अपॉइंटमेंट्स, इन द यूनिवर्सिटीज ऑफ बिहार, 2026” तथा 9 अगस्त 2026 को जारी पत्र संख्या BSU(Directive)-43/2023(Part-II)-1687/GS(I) के बीच सामंजस्य को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
उक्त स्टैच्यूट के क्लॉज 6.1, 6.2 और 6.3 में सहायक प्राध्यापकों, जिनमें संविदा सहायक प्राध्यापक भी शामिल हैं, की नियुक्ति प्रक्रिया निर्धारित की गई है। क्लॉज 6.2 के अनुसार आयोग की अनुशंसा के आधार पर संबंधित विश्वविद्यालय के कुलपति को नियुक्ति करने की वैधानिक शक्ति प्राप्त है। वहीं क्लॉज 6.3 में संविदा नियुक्ति के मामलों में भी कुलपति को सिंडिकेट की स्वीकृति की प्रत्याशा में नियुक्ति-पत्र जारी करने का अधिकार दिया गया है।
विवाद का मुख्य कारण यह है कि संबंधित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों द्वारा अभी तक नियुक्ति अधिसूचना जारी नहीं किए जाने के बावजूद राजभवन सचिवालय की ओर से शिक्षकों का विषयवार और कॉलेजवार आवंटन किए जाने की बात सामने आई है। 9 अगस्त 2026 के पत्र में “कॉण्ट्रैक्चुअल फैकल्टी अपॉइंटेड फॉर द 211 न्यू डिग्री कॉलेजेज” शब्दावली का प्रयोग किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं कि जब कुलपति ने नियुक्ति ही नहीं की, तो इन शिक्षकों को “नियुक्त शिक्षक” किस आधार पर माना गया। इस मुद्दे पर विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। उनका कहना है कि यदि नियुक्ति की वैधानिक शक्ति कुलपति को प्राप्त है, तो नियुक्ति से पूर्व सीधे कॉलेज आवंटन और पदस्थापना करने का अधिकार किस प्रावधान के तहत प्रयोग किया गया।
एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि 9 अगस्त के पत्र में “बाय द ऑर्डर ऑफ द ऑनरेबल गवर्नर-कम-चांसलर”, “विद द अप्रूवल ऑफ द कॉम्पिटेंट अथॉरिटी” अथवा “ऐज डायरेक्टेड बाय द ऑनरेबल गवर्नर-कम-चांसलर” जैसे स्पष्ट उल्लेख नहीं दिखाई देते। ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या इस पत्र को राज्यपाल-सह-कुलाधिपति की स्वीकृति प्राप्त थी। यदि स्वीकृति प्राप्त थी, तो उसका आदेश संख्या, तिथि या फाइल संदर्भ सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
सूत्रों के अनुसार अभ्यर्थियों से कॉलेजों के लिए पसंदक्रम भी मांगा गया था। बताया जा रहा है कि जिस विश्वविद्यालय में जितने कॉलेज थे, उसके अनुरूप उतने ही विकल्प अभ्यर्थियों से लिए गए। इस प्रक्रिया की पारदर्शिता, समानता और वैधानिकता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
मामले में बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी निगाहें टिक गई हैं। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि स्टैच्यूट में नियुक्ति प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नियुक्ति से पहले कॉलेजवार आवंटन की प्रक्रिया पर उसका क्या रुख था। वरिष्ठ शिक्षकों और विश्वविद्यालय अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर असंतोष बताया जा रहा है कि स्टैच्यूट में निर्धारित प्रक्रिया तथा विश्वविद्यालय के सक्षम प्राधिकारियों की वैधानिक शक्तियों का पूर्ण पालन होना चाहिए। उनका मानना है कि नियुक्ति, आवंटन और पदस्थापना से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए ताकि प्रक्रिया पर उठ रहे संदेह दूर हो सकें।
पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही बन गया है कि क्या 1 जुलाई 2026 को स्वयं राजभवन सचिवालय द्वारा बनाए गए स्टैच्यूट में कुलपति को दी गई नियुक्ति की वैधानिक शक्ति को दरकिनार कर 9 अगस्त 2026 को सचिवालय स्तर से सीधे कॉलेजों का आवंटन और पदस्थापना की जा सकती है। अब निगाहें राजभवन सचिवालय, राज्यपाल-सह-कुलाधिपति, बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग और संबंधित विश्वविद्यालयों पर हैं कि वे स्टैच्यूट के प्रावधानों तथा 9 अगस्त 2026 के पत्र की वैधानिक स्थिति पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हैं।