हंगामे की भेंट चढ़ा सदन : लोकसभा में पीएम के सम्बोधन के बिना पारित हुआ धन्यवाद प्रस्ताव
- Post By Admin on Feb 05 2026
नई दिल्ली : बजट सत्र के सातवें दिन संसद में एक ऐतिहासिक और असामान्य स्थिति देखने को मिली, जब विपक्ष के भारी हंगामे के बीच राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बिना ही पारित कर दिया गया। यह घटना आखिरी बार जून 2004 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई थी, जब विपक्षी विरोध के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री को सदन में बोलने का अवसर नहीं मिल पाया था।
सदन में विपक्ष का रुख शुरू से ही आक्रामक रहा। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने मांग की कि पहले राहुल गांधी को अपनी बात रखने की अनुमति दी जाए, उसके बाद ही प्रधानमंत्री को बोलने दिया जाए। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक राहुल गांधी को लोकसभा में बोलने नहीं दिया जाता, तब तक विपक्ष प्रधानमंत्री को संबोधन की इजाजत नहीं देगा। राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख की कथित अप्रकाशित किताब से जुड़े मुद्दे पर चर्चा करना चाहते थे, जिसको लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बना रहा।
हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित हुई। कार्यवाही शुरू होते ही नारेबाजी और शोर-शराबे के कारण स्पीकर को महज 65 सेकंड में पहली बार सदन स्थगित करना पड़ा। इसके बाद पांच मिनट के भीतर दूसरी बार और दो मिनट के भीतर तीसरी बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। हालात इतने तनावपूर्ण रहे कि प्रधानमंत्री को लोकसभा में बोलने का मौका ही नहीं मिल सका और अंततः धन्यवाद प्रस्ताव बिना उनके संबोधन के पारित कर दिया गया।
लोकसभा में मचे हंगामे की गूंज राज्यसभा में भी सुनाई दी। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने जब राहुल गांधी को बोलने से रोके जाने का मुद्दा उठाया, तो सत्ता पक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने खडग़े से कहा कि राहुल गांधी नियमों का पालन नहीं करते, उन्हें समझाना आपकी जिम्मेदारी है। वहीं भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तंज कसते हुए कहा कि खडग़े जी, कांग्रेस को ‘अबोध बालक’ का बंधक न बनने दें और यह भी स्पष्ट किया कि राज्यसभा में लोकसभा के विषयों पर चर्चा नहीं हो सकती।
सत्ता पक्ष के जवाबों से नाराज विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा से वॉकआउट कर दिया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में अपना भाषण दिया, हालांकि लोकसभा में उनका संबोधन नहीं हो सका।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 10 जून 2004 को भी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्षी हंगामे के कारण धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने का मौका नहीं मिला था। करीब 22 साल बाद एक बार फिर भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसा दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जिसने संसद की कार्यप्रणाली और राजनीतिक टकराव पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।