युद्ध, तकनीक और स्थिर भारत
- Post By Admin on Jul 10 2026
न्यूज डेस्क : अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) हर कुछ महीनों में अपनी विश्व आर्थिक परिदृश्य (World Economic Outlook) रिपोर्ट जारी करता है। इस सप्ताह प्रकाशित जुलाई 2026 संस्करण का शीर्षक है—"युद्ध और प्रौद्योगिकी के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था"। यह शीर्षक मौजूदा वैश्विक आर्थिक स्थिति का सटीक चित्रण करता है।
फरवरी से मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजारों में लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। दूसरी ओर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में तेजी से बढ़ते निवेश ने कई अर्थव्यवस्थाओं को अपेक्षा से बेहतर गति प्रदान की है। IMF का मानना है कि इन दोनों कारकों का प्रभाव काफी हद तक एक-दूसरे को संतुलित कर रहा है। IMF के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि वर्ष 2026 में 3.0 प्रतिशत और 2027 में 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह 2024 और 2025 की औसत 3.5 प्रतिशत वृद्धि से कम है, लेकिन अप्रैल में जारी पूर्वानुमान की तुलना में इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।
भारत सबसे तेज़ बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था
IMF ने वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान अप्रैल के 6.5 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि वर्ष 2027 के लिए अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया गया है। IMF का कहना है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। इसकी मुख्य वजह मजबूत घरेलू खपत (Consumption) और सेवा क्षेत्र (Services Sector) का लगातार विस्तार है।
अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है। चीन, अमेरिका और यूरो क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि विभिन्न कारणों से धीमी पड़ रही है, जबकि भारत की आर्थिक रफ्तार में कमी अपेक्षाकृत सीमित है। इसका कारण यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र पर अधिक आधारित है तथा ऊर्जा और व्यापार झटकों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होती है।
चीन की असमान आर्थिक रिकवरी
IMF के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था 8.1 प्रतिशत की दर से बढ़ी, जो अनुमान से बेहतर रही। इसका श्रेय सार्वजनिक अवसंरचना निवेश और उन्नत विनिर्माण (Advanced Manufacturing) के मजबूत निर्यात को दिया गया है।इसके बावजूद पूरे वर्ष 2026 के लिए चीन की विकास दर 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि 2027 के लिए 4.1 प्रतिशत का अनुमान लगाया गया है।
IMF का कहना है कि चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी रियल एस्टेट क्षेत्र की कमजोरी और घरेलू उपभोग की सुस्ती जैसी संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है। इसलिए चीन को अपनी अर्थव्यवस्था को घरेलू मांग आधारित विकास की ओर ले जाने की आवश्यकता है।
अमेरिका को ऊर्जा का सहारा, यूरोप पर दबाव
IMF के अनुसार, अमेरिका की अर्थव्यवस्था 2026 में 2.3 प्रतिशत और 2027 में 2.2 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। अमेरिका ऊर्जा का शुद्ध निर्यातक होने के कारण तेल कीमतों में वृद्धि से अपेक्षाकृत कम प्रभावित है। साथ ही तकनीकी क्षेत्र में निवेश उसकी अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहा है। हालांकि बढ़ता सार्वजनिक ऋण चिंता का विषय बना हुआ है।
दूसरी ओर यूरो क्षेत्र की स्थिति कमजोर बनी हुई है। 2026 के लिए उसकी विकास दर का अनुमान घटाकर 0.9 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि 2027 में इसमें सुधार होकर 1.2 प्रतिशत रहने की संभावना है। उच्च ऊर्जा लागत और कमजोर उपभोक्ता विश्वास इसके प्रमुख कारण हैं।
आंकड़ों के पीछे युद्ध का प्रभाव
IMF के अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव ऊर्जा बाजारों का है। वर्तमान में तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत अधिक हैं।रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य जुलाई के मध्य तक फिर से सामान्य रूप से खुल जाता है तो मार्च 2027 तक तेल बाजार सामान्य स्थिति में लौट सकते हैं। वैश्विक महंगाई 2026 में बढ़कर 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि 2025 में यह 4.1 प्रतिशत थी। वर्ष 2027 में इसके घटकर 3.9 प्रतिशत रहने की संभावना है।
मध्य पूर्व और मध्य एशिया क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहेगा, जहां 2026 में आर्थिक वृद्धि घटकर 0.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। हालांकि 2027 में पुनर्निर्माण और तेल उत्पादन बढ़ने से इसमें सुधार होकर 6.5 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।IMF का मानना है कि फिलहाल तकनीकी निर्यात और भंडारित संसाधनों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट का असर सीमित रहा है, लेकिन मध्य पूर्व में युद्ध बढ़ने, तकनीकी शेयरों में गिरावट या वैश्विक व्यापार में और विभाजन जैसे जोखिम भविष्य में स्थिति को बिगाड़ सकते हैं।
भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?
IMF का कहना है कि भारत के नीति-निर्माताओं के लिए यह रिपोर्ट राहत का संकेत जरूर है, लेकिन आत्मसंतुष्टि का नहीं। भारत की विकास दर पिछले वर्ष 7.7 प्रतिशत से घटकर इस वर्ष 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह गिरावट अपेक्षाकृत कम है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की घरेलू खपत आधारित अर्थव्यवस्था और मजबूत सेवा क्षेत्र ने ऊर्जा संकट के दौर में उसे अन्य देशों की तुलना में अधिक मजबूती दी है। फिर भी ऊर्जा सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता और आर्थिक सुधारों की गति बनाए रखना आवश्यक होगा। यदि मध्य पूर्व में स्थायी युद्धविराम होता है और तेल की कीमतों में कमी आती है तो भारत जैसी ऊर्जा आयातक अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलेगा। लेकिन यदि संघर्ष और बढ़ता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
IMF की अगली विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट इस वर्ष के अंत में थाईलैंड में होने वाली वार्षिक बैठक के दौरान जारी की जाएगी। तब तक जुलाई 2026 की यह रिपोर्ट युद्ध और तकनीकी परिवर्तन के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था की मौजूदा तस्वीर प्रस्तुत करती है, जिसमें भारत अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।
लेखक: राजेश कुमार