शारदा सिन्हा: एक आवाज, जिसमें बसता है बिहार, एक विरासत जो कभी समाप्त नहीं होगी
- Post By Admin on Nov 05 2026
आज बिहार की उस महान लोकगायिका शारदा सिन्हा की दूसरी पुण्यतिथि है, जिनकी आवाज समय की सीमाओं को पार कर करोड़ों लोगों की स्मृतियों और भावनाओं में हमेशा के लिए बस गई है। उन्हें याद करना केवल एक महान कलाकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपनी सभ्यता, अपने संस्कार और अपनी सांस्कृतिक विरासत को नमन करना है।
बिहार से लेकर देश-दुनिया तक छठ महापर्व के अवसर पर शारदा सिन्हा जी के गीतों का गूंजना महज एक संयोग नहीं है। यह हमारी संस्कृति के साथ उनके संगीत के उस गहरे जुड़ाव का प्रमाण है, जिसे दशकों की साधना ने आकार दिया। छठ के गीतों से लेकर विवाह संस्कारों तक, उनके स्वरों में बिहार का लोकजीवन सांस लेता है। उनकी आवाज कानों के रास्ते सीधे अंतरात्मा तक पहुंचती है। ऐसा लगता है मानो गीत नहीं बज रहा, बल्कि घर-आंगन की कोई पुरानी स्मृति, मां की कोई पुकार और गांव की कोई भूली-बिसरी परंपरा फिर से जीवंत हो रही हो।
छठ महापर्व का दृश्य याद कीजिए। घाटों पर सजी पूजन सामग्री, बांस के दउरे, सूप में रखे फल, जल में खड़े व्रती, डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने की प्रतीक्षा और वातावरण में गूंजता गीत ‘केलवा के पात पर उगलन सूरजमल झांके-झुके’। इस पूरे दृश्य में शारदा सिन्हा की आवाज केवल संगीत नहीं रहती, वह पर्व की अनुभूति बन जाती है। ‘पहिले-पहिल छठी मइया’, ‘हे दीनानाथ’, ‘मारबो रे सुगवा धनुष से’ जैसे गीतों ने छठ की लोकपरंपरा को ऐसी पहचान दी कि बिहार से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोग भी इन स्वरों को सुनकर अपने गांव, अपने घर और अपने परिवार के बीच पहुंच जाते हैं। यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। उन्होंने बिहार को केवल गीत नहीं दिए, बल्कि बिहार के लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक भावनात्मक माध्यम दिया। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, मॉरीशस, सूरीनाम या दुनिया के किसी दूसरे कोने में रहने वाला बिहारी जब छठ के अवसर पर शारदा सिन्हा का गीत सुनता है, तो उसके भीतर अपने गांव की मिट्टी की खुशबू जाग उठती है। यही लोकसंगीत की ताकत है और यही शारदा सिन्हा की अमरता का आधार भी।
उनकी महानता केवल छठ गीतों तक सीमित नहीं थी। विवाह गीतों में बेटी की विदाई का दर्द, मां के स्नेह की अनुभूति, भाई-बहन का प्रेम, पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता और सामाजिक परंपराओं की मिठास उनके स्वरों में अद्भुत तरीके से उतरती थी। मैथिली, भोजपुरी, मगही और हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं में उन्होंने लोकगीतों को अपनी आवाज दी। उनके गीतों में लोकजीवन की सादगी थी, शास्त्रीय संगीत की साधना थी और भावनाओं की ऐसी गहराई थी, जो श्रोता को भीतर तक छू जाती थी।
सुपौल जिले के हुलास गांव से शुरू हुआ उनका संगीत का सफर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा। शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा, गुरुजनों का मार्गदर्शन और वर्षों की साधना ने उनकी गायकी को विशिष्ट पहचान दी। वर्ष 1971 में मैथिली गीत ‘दुलरुआ भैया’ से उनकी संगीत यात्रा ने नई पहचान बनानी शुरू की। आगे चलकर उन्होंने लोकसंगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी प्रतिभा का विस्तार फिल्मी दुनिया तक भी हुआ। ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ जैसी फिल्मों में उनकी आवाज ने क्षेत्रीय संगीत और मुख्यधारा के सिनेमा के बीच एक सुंदर सेतु बनाया। उन्हें वर्ष 1991 में पद्मश्री, 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2018 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके निधन के बाद वर्ष 2025 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। ये सम्मान उनकी उपलब्धियों का प्रमाण हैं, लेकिन सच यह है कि बिहार के करोड़ों लोगों के दिलों में जो स्थान उन्हें मिला, वह किसी पुरस्कार से बड़ा है। शारदा सिन्हा का निधन 5 नवंबर 2024 को दिल्ली के एम्स में हुआ। उनका जाना संगीत जगत के लिए एक बड़ी क्षति थी, लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी आवाज खामोश नहीं हुई। हर साल छठ आता है और उनके गीत फिर से घरों, गलियों, बाजारों और घाटों पर सुनाई देने लगते हैं। यह अपने आप में किसी कलाकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसका शरीर भले ही संसार में न रहे, लेकिन उसकी कला पीढ़ियों के जीवन का हिस्सा बनी रहे।
आज उनके जाने के दो वर्ष बाद हमें एक सवाल अपने आप से भी पूछना चाहिए। क्या हम केवल उनके गीत सुनकर अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं? क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को उन लोकगीतों, लोकभाषाओं और परंपराओं से जोड़ पा रहे हैं, जिन्हें शारदा सिन्हा ने जीवनभर अपने स्वरों से संजोया? क्या हमारे गांवों में लोकगायन की परंपरा को उतना सम्मान मिल रहा है, जितना मिलना चाहिए? शारदा सिन्हा की विरासत को बचाने का अर्थ केवल उनके पुराने गीतों को सुनते रहना नहीं है। इसका अर्थ है मैथिली, भोजपुरी, मगही और बज्जिका जैसी भाषाओं के लोकसंगीत को सम्मान देना, पारंपरिक कलाकारों को मंच उपलब्ध कराना, नई पीढ़ी को लोकसंस्कृति से जोड़ना और अपनी सांस्कृतिक पहचान को बाजारवाद की दौड़ में खोने से बचाना।
आज आधुनिक संगीत के दौर में लोकगीतों के स्वरूप और प्रस्तुति में बदलाव आ रहा है। बदलाव समय की मांग हो सकता है, लेकिन अपनी जड़ों को भुला देना प्रगति नहीं है। शारदा सिन्हा ने साबित किया कि लोकसंगीत को उसकी मौलिकता के साथ भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है। उनके गीतों में न तो अपनी भाषा के प्रति संकोच था और न अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करने में कोई झिझक। बिहार को उन पर गर्व है। लेकिन केवल गर्व करना पर्याप्त नहीं है। उनके संगीत और सांस्कृतिक योगदान को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी हमारी जिम्मेदारी है। बिहार की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके ऐतिहासिक स्थलों, पर्व-त्योहारों और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि उन कलाकारों से भी बनती है, जो इन सबको अपनी कला के माध्यम से जीवित रखते हैं।
शारदा सिन्हा जी उन्हीं महान विभूतियों में से एक थीं। वे बिहार की आवाज थीं, लोकसंस्कृति की संवाहक थीं और करोड़ों लोगों की भावनाओं का संगीत थीं। आज जब छठ के घाटों पर उनकी आवाज गूंजेगी, जब किसी बेटी की शादी में उनके विवाह गीत बजेंगे और जब परदेस में बैठा कोई बिहारी उनका गीत सुनकर अपने गांव को याद करेगा, तब यह एहसास होगा कि कुछ आवाजें कभी विदा नहीं होतीं। शारदा सिन्हा जी, आप हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपके गीतों में हमारा बिहार आज भी जीवित है। आपकी आवाज में हमारी मांओं की ममता है, हमारी मिट्टी की खुशबू है, हमारे संस्कारों की मिठास है और हमारी सभ्यता की पहचान है। बिहार कोकिला को उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर सादर नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि। आपकी आवाज गूंजती रहेगी, जब तक बिहार की मिट्टी में लोकसंस्कृति की सांस बाकी है।
© प्रभाष कुमार, संपादक सुदामा न्यूज़