जयंती विशेष: क्रांति की रीढ़ थे शहीद सुखदेव, रणनीति ऐसी कि अंग्रेज भी रह गए थे हैरान
- Post By Admin on May 15 2026
नई दिल्ली: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी शौर्य और बलिदान की बात होती है, तो भगत सिंह और राजगुरु के साथ एक नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जाता है वो हैं सुखदेव थापर। आज उनकी जयंती के अवसर पर देश उस महान क्रांतिकारी को याद कर रहा है, जिन्होंने मात्र 24 साल की उम्र में हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया था।
- कुशल रणनीतिकार और संगठनकर्ता
सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। उन्हें 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) का मुख्य रणनीतिकार माना जाता था। इतिहासकार बताते हैं कि जहाँ भगत सिंह संगठन का चेहरा और आवाज थे, वहीं सुखदेव संगठन की 'रीढ़ की हड्डी' थे। वे पर्दे के पीछे रहकर ऐसी योजनाएँ बनाते थे कि ब्रिटिश खुफिया तंत्र भी उन्हें समझ नहीं पाता था।
- लाहौर षड्यंत्र केस के 'मुख्य आरोपी'
बहुत कम लोग जानते हैं कि लाहौर षड्यंत्र केस की जो FIR दर्ज हुई थी, उसमें सुखदेव का नाम नंबर एक पर था। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स के वध की पूरी योजना सुखदेव ने ही तैयार की थी। वे युवाओं को जोड़ने के लिए 'नौजवान भारत सभा' के संस्थापक सदस्य भी रहे।
"क्रांति का अर्थ केवल अंग्रेजों को भगाना नहीं है, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज बनाना है।" शहीद सुखदेव
- अंतिम समय तक अडिग
23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में जब उन्हें फाँसी दी गई, तो उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था। सुखदेव का मानना था कि उनकी शहादत भारतीय युवाओं के दिलों में आजादी की जो आग जलाएगी, उसे कोई ब्रिटिश हुकूमत बुझा नहीं पाएगी।
- विरासत जो आज भी प्रेरित करती है
आज भी लुधियाना में उनका पैतृक घर और उनके नाम पर बने कॉलेज (SSCBS, दिल्ली विश्वविद्यालय) उनकी यादों को संजोए हुए हैं। सुखदेव केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक प्रखर विचारक थे जो सामाजिक समानता और शिक्षा को आजादी का असली आधार मानते थे।