ट्रंप की इमिग्रेशन नीति को अदालत का झटका, एच-1बी फीस बढ़ोतरी रद्द

  • Post By Admin on Jun 09 2026
ट्रंप की इमिग्रेशन नीति को अदालत का झटका, एच-1बी फीस बढ़ोतरी रद्द

वॉशिंगटन :अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एच-1बी वीजा नीति को बड़ा झटका देते हुए संघीय अदालत ने विदेशी कुशल पेशेवरों की भर्ती पर प्रस्तावित 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त शुल्क को अवैध घोषित कर दिया है। अदालत के इस फैसले से अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और खासकर एच-1बी वीजा पर अमेरिका में रोजगार की उम्मीद रखने वाले हजारों भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है। अमेरिकी जिला न्यायाधीश रिचर्ड स्टर्न्स ने अपने फैसले में कहा कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति इस प्रकार का अतिरिक्त शुल्क लागू नहीं कर सकते। उन्होंने इसे संविधान में निर्धारित शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के विपरीत बताते हुए अमान्य करार दिया।

ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में घोषणा की थी कि नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करेंगी और स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। ट्रंप और उनके समर्थकों का आरोप रहा है कि कुछ कंपनियां एच-1बी कार्यक्रम का उपयोग कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए करती हैं। ट्रंप ने अपनी घोषणा में कहा था कि एच-1बी कार्यक्रम के कथित दुरुपयोग से राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी रोजगार बाजार प्रभावित हो रहा है। प्रशासन का मानना था कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के कदम आवश्यक हैं।

अदालत ने हालांकि स्पष्ट किया कि इस तरह का शुल्क लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। यही वजह है कि कैलिफोर्निया समेत 20 डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों द्वारा दायर चुनौती को स्वीकार करते हुए अदालत ने इस नीति को रद्द कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि करीब छह महीने पहले वॉशिंगटन डीसी की एक संघीय अदालत ने इसी मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाया था। उस समय न्यायाधीश बेरिल होवेल ने माना था कि कांग्रेस ने राष्ट्रपति को ऐसा शुल्क लगाने का पर्याप्त अधिकार दिया है। लेकिन बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण टैरिफ संबंधी फैसले ने कानूनी परिदृश्य बदल दिया, जिसके आधार पर न्यायाधीश स्टर्न्स ने अलग निष्कर्ष निकाला।

इस नीति का कई राज्यों, शिक्षा संस्थानों और उद्योग संगठनों ने विरोध किया था। आलोचकों का कहना था कि इससे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में पहले से मौजूद कुशल कर्मचारियों की कमी और बढ़ सकती है। अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स समेत कई कारोबारी संगठनों ने भी इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी। भारतीय पेशेवरों के लिए यह फैसला विशेष महत्व रखता है, क्योंकि हर वर्ष जारी होने वाले एच-1बी वीजा में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है। आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, वित्त और अनुसंधान क्षेत्रों में कार्यरत हजारों भारतीय इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं।

एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष तकनीकी योग्यता या कम से कम स्नातक डिग्री वाले विदेशी पेशेवरों को अस्थायी रूप से नियुक्त करने की अनुमति देता है। वर्तमान में अमेरिकी कांग्रेस ने प्रतिवर्ष 65,000 एच-1बी वीजा की सीमा तय कर रखी है, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध हैं। इमिग्रेशन अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन एफडब्ल्यूडी.यूएस के अनुसार, फिलहाल अमेरिका में लगभग 7.30 लाख एच-1बी वीजा धारक और उनके करीब 5.50 लाख आश्रित रह रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन उच्च अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। ऐसे में एच-1बी वीजा को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।