सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा तय, सुप्रीम कोर्ट ने ओपन कैटेगरी पर साफ किया रुख
- Post By Admin on Jan 07 2026
नई दिल्ली : सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दिनों में दो महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए ‘ओपन कैटेगरी’ और ‘रिजर्वेशन का लाभ’ क्या है, इस पर पूरी तरह से स्थिति साफ कर दी है। इन फैसलों का असर सामान्य वर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के उम्मीदवारों पर भी पड़ेगा।
शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा है कि आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार यदि चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण में बिना किसी छूट या रियायत का लाभ लिए सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से बेहतर प्रदर्शन करता है, तो उसे जनरल या ओपन कैटेगरी में ही शामिल किया जाएगा। लेकिन यदि उसने प्रारंभिक स्तर पर भी किसी प्रकार की छूट या रियायत ली है, तो वह अनारक्षित पदों का दावा नहीं कर सकता।
‘ओपन कैटेगरी’ का अर्थ सिर्फ मेरिट
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 19 दिसंबर को राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ओपन कैटेगरी का मतलब पूरी तरह ‘खुला’ है, जहां चयन का एकमात्र आधार योग्यता यानी मेरिट है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जाति, वर्ग या लिंग के आधार पर किसी उम्मीदवार को ओपन कैटेगरी से बाहर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदन पत्र में आरक्षित श्रेणी का उल्लेख कर देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उम्मीदवार केवल आरक्षित पद के लिए ही योग्य है। यदि उसने किसी भी स्तर पर छूट नहीं ली है, तो उसे सामान्य सूची में शामिल किया जाना चाहिए।
कर्नाटक IFS मामले में सख्त रुख
दूसरे अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक से जुड़े भारतीय वन सेवा (IFS) कैडर विवाद पर सुनवाई करते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया एकीकृत होती है। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने साफ किया कि प्रारंभिक परीक्षा मुख्य परीक्षा का अभिन्न हिस्सा होती है और प्रारंभिक चरण में ली गई किसी भी रियायत को बाद के चरणों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मामले में अनुसूचित जाति के उम्मीदवार जी. किरण ने प्रारंभिक परीक्षा में रियायती कट-ऑफ का लाभ लिया था, हालांकि अंतिम मेरिट में उसकी रैंक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से बेहतर थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार रियायत ली गई, तो अनारक्षित पदों पर दावा नहीं किया जा सकता, भले ही अंतिम रैंक बेहतर क्यों न हो।
राजस्थान हाई कोर्ट भर्ती मामला क्या था
यह विवाद अगस्त 2022 में राजस्थान हाई कोर्ट और जिला अदालतों में जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के 2,756 पदों की भर्ती से जुड़ा था। चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट शामिल थे। परिणाम आने के बाद यह सामने आया कि कुछ आरक्षित श्रेणियों के कट-ऑफ अंक सामान्य श्रेणी से अधिक थे।
कुछ उम्मीदवारों ने सामान्य कट-ऑफ पार कर लिया था, लेकिन अपनी श्रेणी के कट-ऑफ से कम अंक होने के कारण उन्हें आगे की प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। हाई कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन के रूप में देखा और कहा कि जो उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में शामिल किया जाना चाहिए*। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया।
इंदिरा साहनी फैसले की पुनः पुष्टि
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों फैसले इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में तय सिद्धांतों को ही और मजबूत करते हैं। उस फैसले में भी कहा गया था कि आरक्षित श्रेणी के मेधावी उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के आधार पर अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ‘डबल बेनिफिट’ यानी एक साथ आरक्षण और सामान्य श्रेणी दोनों का लाभ नहीं दिया जा सकता।
उम्मीदवारों के लिए क्या मायने
इन फैसलों के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि
बिना रियायत मेरिट से चयन - ओपन/जनरल कैटेगरी में स्थान
किसी भी चरण में रियायत ली - केवल आरक्षित श्रेणी में ही विचार
सुप्रीम कोर्ट की इस स्पष्ट व्याख्या से भविष्य की भर्तियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में विवाद कम होने की उम्मीद है और मेरिट आधारित चयन प्रणाली को संवैधानिक मजबूती मिली है।