पितृत्व अवकाश पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत, केंद्र से कानून बनाने पर विचार की अपील
- Post By Admin on Mar 18 2026
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से इसे सामाजिक सुरक्षा के दायरे में शामिल करने के लिए कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के समग्र विकास में पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम है जितनी मां की।
यह टिप्पणी जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला उस नियम से जुड़ा था, जिसमें गोद लेने वाली मां को केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश दिया जाता था।
गोद लेने वाली माताओं को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को खारिज करते हुए कहा कि गोद लेने वाली मां को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो। कोर्ट ने इसे समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बताया।
पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना अनुचित
पीठ ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक विकास में पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत। माता-पिता बनना एक साझा जिम्मेदारी है, जिसमें दोनों की समान भागीदारी आवश्यक है।
शुरुआती समय में दोनों की मौजूदगी जरूरी
अदालत ने कहा कि बच्चे के जीवन के शुरुआती महीने और वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, जब माता-पिता और बच्चे के बीच गहरा भावनात्मक संबंध बनता है। ऐसे समय में पिता की अनुपस्थिति इस अनुभव को अधूरा बना सकती है।
मां के लिए भी जरूरी है पिता का सहयोग
कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में पिता का सहयोग मां के लिए बेहद जरूरी होता है। पितृत्व अवकाश मिलने से पिता परिवार की जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
लैंगिक समानता को मिलेगा बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व अवकाश लागू होने से यह धारणा बदलेगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। इससे समाज और कार्यस्थल दोनों जगह लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। अदालत ने सुझाव दिया कि पितृत्व अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए, जो परिवार की जरूरतों के अनुरूप हो, ताकि पिता भी बच्चे के शुरुआती विकास में सक्रिय योगदान दे सकें।