शांति दूत सरला श्रीवास की जयंती पर ‘कठपुतली संवाद’, लोककला संरक्षण का संकल्प

  • Post By Admin on Aug 14 2026
शांति दूत सरला श्रीवास की जयंती पर ‘कठपुतली संवाद’, लोककला संरक्षण का संकल्प

नई दिल्ली : कापसहेड़ा, नई दिल्ली स्थित सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन के तत्वावधान में शांति दूत एवं प्रख्यात कठपुतली कलाकार सरला श्रीवास की 40वीं जयंती के अवसर पर ‘कठपुतली संवाद’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कठपुतली संवाद संस्थान के सचिव एवं वरिष्ठ कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने की।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुनील कुमार ने कहा कि भारत की लोककलाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि कठपुतली कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जागरूकता का प्रभावी साधन रही है। उन्होंने सरला श्रीवास को इस परंपरा को जीवंत रखने वाला प्रेरक व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि उन्होंने कठपुतली कला को प्रेम, शांति, भाईचारे और मानवीय मूल्यों के प्रसार का सशक्त माध्यम बनाया।

वक्ताओं ने कहा कि सरला श्रीवास के लिए कला केवल मंचीय अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि समाज परिवर्तन का प्रभावी साधन थी। उनके व्यक्तित्व में सादगी, संवेदनशीलता, सेवा भावना और लोकसंस्कृति के प्रति गहरा समर्पण दिखाई देता था। उन्होंने कठपुतली और लोककला के माध्यम से शिक्षा, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार, स्वास्थ्य जागरूकता तथा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जन-जागरण का संदेश दिया। कार्यक्रम में सरला श्रीवास युवा मंडल की अध्यक्ष सुमन कुमारी ने कहा कि सरला श्रीवास का जीवन यह प्रेरणा देता है कि कला तभी सार्थक होती है, जब वह समाज के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बने। उन्होंने कहा कि सरला श्रीवास कठपुतली कला के जरिए समाज को जोड़ने, जागृत करने और शांति का संदेश देने वाली सशक्त सांस्कृतिक हस्ताक्षर थीं।

इस अवसर पर सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा संचालित गतिविधियों की भी जानकारी दी गई। संस्था लोककला, संस्कृति, नाटक, लोकगीत और कठपुतली कला के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, अंगदान, देहदान और सामाजिक जागरूकता से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित कलाकारों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने सरला श्रीवास की स्मृति को नमन करते हुए कठपुतली कला, लोककला, लोक संस्कृति और मानवता की इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का सामूहिक संकल्प लिया।