मुंबई के ताज होटल में आयोजित कार्यक्रम में काइरोप्रैक्टिक तकनीक का लाइव डेमो
- Post By Admin on Oct 16 2026
मुंबई: प्रसिद्ध लेखक चेतन भगत ने मुंबई के ताज होटल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान डॉ. रजनीश कांत की पुस्तक ‘कायरोप्रैक्टर एंड फिजियोथेरेपिस्ट’ का लोकार्पण किया। टीएस पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में काइरोप्रैक्टिक पद्धति, रीढ़ की हड्डी के स्वास्थ्य और दर्द से जुड़ी समस्याओं की देखभाल के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी गई है। डॉ. रजनीश कांत का उद्देश्य लोगों को दर्द प्रबंधन और शरीर के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. रजनीश कांत ने मंच पर काइरोप्रैक्टिक तकनीक का लाइव डेमो भी प्रस्तुत किया। इस दौरान उन्होंने चेतन भगत की कलाई पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया। कार्यक्रम के विवरण के अनुसार, डेमो के बाद चेतन भगत ने आराम महसूस होने की बात कही। इस अवसर पर किन्नर जगतगुरु महामंडलेश्वर हिमांगी सखी जी भी मौजूद रहीं। सुप्रसिद्ध फिजियोथेरेपिस्ट प्रोफेसर डॉ. अली इरानी का आशीर्वाद भी डॉ. रजनीश कांत को मिला।
पुस्तक के लोकार्पण पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए डॉ. रजनीश कांत ने कहा कि वह बचपन से चेतन भगत के उपन्यास पढ़ते रहे हैं और उनकी कहानियों पर आधारित फिल्में भी देखते आए हैं। उनके साथ मंच साझा करना और उनके हाथों अपनी पुस्तक का लोकार्पण होना उनके लिए विशेष अनुभव है। उन्होंने फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के चर्चित संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने मनपसंद क्षेत्र में काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि वह अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करते हुए भारत के साथ-साथ दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। डॉ. रजनीश कांत के अनुसार, पुस्तक के पहले संस्करण का उद्देश्य लोगों को काइरोप्रैक्टिक पद्धति की बुनियादी जानकारी देना है। इसमें बताया गया है कि यह पद्धति क्या है, इसका विकास कैसे हुआ और किन परिस्थितियों में इसका उपयोग किया जाता है। उन्होंने अपनी मान्यता के तहत इस पद्धति को भारतीय परंपरा तथा द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा कुब्जा को सीधा करने की कथा से भी जोड़ा है। आधुनिक काइरोप्रैक्टिक के इतिहास में डैनियल डेविड पामर का महत्वपूर्ण स्थान है। पुस्तक में इस पद्धति के ऐतिहासिक विकास का भी उल्लेख किया गया है। प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पामर ने 1895 में अमेरिका में काइरोप्रैक्टिक एडजस्टमेंट किया था और वर्ष 1907 में पामर स्कूल ऑफ काइरोप्रैक्टिक की स्थापना हुई थी।
पुस्तक में शामिल हैं 10 अध्याय
पुस्तक में कुल 10 अध्याय हैं। इनमें काइरोप्रैक्टिक देखभाल की बुनियादी अवधारणाओं, क्लिनिकल अवलोकन, खिलाड़ियों और सक्रिय जीवनशैली अपनाने वाले लोगों की देखभाल, बुजुर्गों के लिए काइरोप्रैक्टिक, रीढ़ की हड्डी के स्वास्थ्य का विज्ञान और इस पद्धति से जुड़ी गलत धारणाओं जैसे विषय शामिल हैं। इसके अलावा मरीजों को जागरूक करने, स्वयं की देखभाल, आरकेएम पद्धति, काइरोप्रैक्टिक क्लिनिक के संचालन और बेहतर देखभाल के लिए अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ समन्वय स्थापित करने पर भी जानकारी दी गई है।
डॉ. रजनीश कांत का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल दर्द से राहत दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को दर्द के साथ जीवन बिताने की मजबूरी से बाहर निकालने के लिए जागरूक करना भी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि पुस्तक के माध्यम से पाठकों को काइरोप्रैक्टिक के बारे में शुरुआती जानकारी मिलेगी। उन्होंने आगे के संस्करण में अपनी व्यक्तिगत तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी देने की योजना भी साझा की। हालांकि, काइरोप्रैक्टिक तकनीकों की उपयुक्तता और सुरक्षा व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करती है। खासकर गर्दन और रीढ़ से जुड़ी तकनीकों का इस्तेमाल प्रशिक्षित विशेषज्ञ की सलाह और उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन के बाद ही किया जाना चाहिए।