यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, सीजेआई बोले- भाषा अस्पष्ट
- Post By Admin on Jan 29 2026
नई दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए इक्विटी नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। गुरुवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026’ के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं है और इससे दुरुपयोग की गंभीर आशंका पैदा होती है, इसलिए इनकी समीक्षा आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया और सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिया कि वे मामले में अपना पक्ष रखें। साथ ही, कोर्ट ने इन नियमों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करने को भी कहा। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है, जिसे सुधारना जरूरी है ताकि समाज में किसी तरह का भेदभाव न बढ़े। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नए नियमों को दोबारा ड्राफ्ट किया जाए और तब तक इन पर रोक जारी रहेगी।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि इन नियमों का एक प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत या राहत का कोई स्पष्ट आधार नहीं मिलता। इस पर सीजेआई ने सवाल उठाया कि क्या सामान्य वर्ग को इन नियमों में कवर नहीं किया गया है। जवाब में वकील ने कहा कि ये नियम जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने भी अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 15(4) राज्यों को आरक्षित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है, लेकिन कोई भी प्रगतिशील कानून समाज को पीछे की ओर नहीं ले जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिका के उदाहरण का हवाला देते हुए चेताया कि भारत को ऐसे हालात की ओर नहीं बढ़ना चाहिए, जहां समाज अलग-अलग वर्गों में बंट जाए।
गौरतलब है कि यूजीसी के इन नए नियमों को लेकर देशभर में पहले से ही विवाद चल रहा था। कई संगठनों और छात्रों ने इन्हें विभाजनकारी बताया था। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने भी कोर्ट को बताया कि 2012 के नियमों को चुनौती देने वाली याचिका अभी लंबित है, जबकि 2026 के नियमों ने उन्हें बदल दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब केंद्र सरकार को अपनी नीति पर दोबारा विचार करना पड़ेगा।