लखीसराय के बलगुदर टीले से मिलीं 1,000 साल पुरानी प्रतिमाएं, बच्चों ने संग्रहालय को सौंपीं
- Post By Admin on Oct 17 2026
लखीसराय : बिहार के लखीसराय जिले में स्थित राजकीय पुरातात्विक स्थल बलगुदर टीले से 10वीं-11वीं शताब्दी की दो प्राचीन खंडित प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ और पौराणिक देवता अग्नि देव की प्रतिमाएं शामिल हैं। स्थानीय बच्चों की सतर्कता और ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति जागरूकता के कारण दोनों प्रतिमाओं को राजकीय संग्रहालय पहुंचाया गया, जहां उन्हें सुरक्षित संरक्षित कर लिया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलगुदर टीले के आसपास मिट्टी की कटाई के दौरान ये प्राचीन प्रतिमाएं सतह पर दिखाई दीं। पुरातात्विक स्थल की सुरक्षा के लिए विभाग की ओर से चारदीवारी का निर्माण कराया गया है, लेकिन इसके बावजूद कुछ स्थानीय लोगों द्वारा परिसर में मवेशी बांधने और अनधिकृत रूप से मिट्टी काटने की गतिविधियां किए जाने की बात सामने आई है। ऐसी गतिविधियों से ऐतिहासिक अवशेषों को नुकसान पहुंचने और पुरातात्विक स्थल के क्षरण का खतरा बना रहता है।
बच्चों की सजगता से सुरक्षित हुईं ऐतिहासिक धरोहरें
टीले के पास खेल रहे शिवम कुमार, दिलखुश कुमार, मोहित कुमार, शुभम कुमार, ऋषभ कुमार और सुमित कुमार की नजर मिट्टी से निकली इन प्रतिमाओं पर पड़ी। बच्चों ने इन्हें सामान्य पत्थर समझकर छोड़ने के बजाय ऐतिहासिक महत्व की वस्तु मानते हुए राजकीय संग्रहालय कार्यालय पहुंचाया। वहां उन्होंने दोनों प्रतिमाएं तकनीकी सहायक राजेश कुमार को सौंप दीं। बच्चों की इस पहल से प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित रखने में मदद मिली। उनकी जागरूकता को संग्रहालय प्रशासन ने सराहनीय बताया है। स्थानीय स्तर पर बच्चों की इस जिम्मेदारी को ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के प्रति सकारात्मक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

भगवान ऋषभनाथ और अग्नि देव की प्रतिमा मिली
संग्रहालय में प्रतिमाएं पहुंचने के बाद कर्मचारियों और तकनीकी सहायक राजेश कुमार की देखरेख में उनकी सफाई कराई गई। प्रारंभिक जांच के आधार पर पहली प्रतिमा की पहचान जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ के रूप में की गई है। इसका आकार 27.4 × 28 × 8 सेंटीमीटर बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह प्रतिमा 10वीं से 11वीं शताब्दी की है। जैन धर्म में भगवान ऋषभनाथ को प्रथम तीर्थंकर के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। उनकी प्रतिमा का मिलना क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रतिमा खंडित अवस्था में प्राप्त हुई है, इसलिए इसके ऐतिहासिक और कलात्मक पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए आगे का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।
दूसरी प्रतिमा की पहचान पौराणिक देवता अग्नि देव के रूप में की गई है। इसका माप 14.5 × 9.2 × 6.1 सेंटीमीटर है। इसे भी लगभग 10वीं से 11वीं शताब्दी का बताया गया है। दोनों प्रतिमाओं का एक ही पुरातात्विक स्थल से मिलना उस समय की धार्मिक मान्यताओं, मूर्तिकला और क्षेत्र की सांस्कृतिक गतिविधियों के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। प्रतिमाओं की प्रारंभिक पहचान के बाद तकनीकी सहायक राजेश कुमार ने इसकी सूचना सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार को दी। इसके बाद दोनों ऐतिहासिक अवशेषों को संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया, ताकि उनका संरक्षण किया जा सके और भविष्य में उनके अध्ययन की संभावना बनी रहे।

बलगुदर टीले के संरक्षण की अपील
संग्रहालय प्रशासन ने बच्चों द्वारा दिखाई गई जागरूकता की प्रशंसा करते हुए स्थानीय ग्रामीणों और प्रशासन से बलगुदर टीले की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की अपील की है। प्रशासन और संबंधित विभाग से अपेक्षा की गई है कि पुरातात्विक स्थल पर मवेशी बांधने, मिट्टी काटने और अन्य अनधिकृत गतिविधियों को रोका जाए। पुरातात्विक स्थल केवल पुराने अवशेषों का संग्रह नहीं होते, बल्कि वे किसी क्षेत्र के अतीत, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विकास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। बलगुदर टीले से मिली इन दोनों प्रतिमाओं ने एक बार फिर स्थानीय ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की जरूरत को रेखांकित किया है। बच्चों की पहल से सुरक्षित हुई ये प्रतिमाएं इस बात का उदाहरण हैं कि सामुदायिक जागरूकता भी प्राचीन धरोहरों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।