जयंती स्पेशल : भगवती चरण वर्मा – साहित्य से सिनेमा तक का अद्भुत सफर

  • Post By Admin on Aug 29 2025
जयंती स्पेशल : भगवती चरण वर्मा – साहित्य से सिनेमा तक का अद्भुत सफर

नई दिल्ली : हिंदी साहित्य के दिग्गज रचनाकार भगवती चरण वर्मा को हम उपन्यासों, कहानियों और कविताओं के लिए जानते हैं, लेकिन उनका जीवन सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रहा। जीवन में ऐसे कई मोड़ आए, जब वो साहित्य, समाज और सिनेमा की गलियों से गुजरते नजर आए। इन्हीं में से एक बदलाव उनके जीवन में सपनों की नगरी मुंबई लेकर आई।

भगवती चरण वर्मा एक जमाने के चर्चित कवि हुआ करते थे। उसके अलावा उपन्यासकार और कहानीकार के तौर पर उन्हें पहचान मिली। उनके उपन्यासों में समाज का चित्रण दिखाई देता है। साहित्य-मंडल में अनगिनत कलाकार आते हैं, जिनमें से कुछ समय के साथ भुला दिए जाते हैं। हालांकि, कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी प्रतिभा का प्रकाश पूरे साहित्य-जगत को आलोकित कर देता है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, सहज कवि और उपन्यासकार भगवती चरण वर्मा का कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व था।

1903 का हिंदुस्तान अंग्रेजों की गुलामी में जकड़ा हुआ था। उसी दौर में 30 अगस्त को उत्तर प्रदेश के उन्नाव में बाबू देवीचरण वर्मा के घर भगवती चरण वर्मा का जन्म हुआ। भगवती चरण वर्मा को छोटी उम्र से कविता लिखने का शौक था। स्कूली शिक्षा के दौरान कुछ पत्रिकाओं में उनके लेख भी छपने लगे। 15 साल की उम्र में वे कानपुर के विशिष्ट साहित्यिक गुट का हिस्सा बने, जहां कुछ कहानीकारों और कवियों के साथ उनके संपर्क बने।

1926 में इलाहाबाद से एलएलबी की और वकालत को चुना, लेकिन करियर सफल नहीं रहा। हालांकि, वकालत के दौरान ही, उन्हें लेखन कार्य की ओर एक नई राह मिली। उन्होंने कवि के रूप में साहित्यिक जीवन का प्रारंभ किया था, फिर भी वे कवि की अपेक्षा कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में अधिक प्रख्यात हुए।

'हम तो जहां पहुंचते हैं, बैठ जाते हैं', भगवती चरण वर्मा इन्हीं शब्दों को जीवन में उतारकर आगे बढ़े और फिल्मों की तरफ रुझान बढ़ाया। उनके बेहद लोकप्रिय उपन्यास 'चित्रलेखा' पर फिल्में बनीं। फिल्म जगत में अपने जीवन की शुरुआत के बारे में भगवती चरण वर्मा ने प्रसार भारती को दिए एक इंटरव्यू में विस्तार से जानकारी दी थी।

भगवती चरण वर्मा को उनके एक मित्र ने बॉम्बे टॉकीज का एक निमंत्रण दिलवाया। वह ऐसा निमंत्रण था कि उसके जरिए वहां जाते ही नौकरी पक्की थी। बॉम्बे टॉकीज में आने-जाने का खर्चा भी मिला। इस निमंत्रण को लेकर वे वहां गए। उन्हीं दिनों कोलकाता में एक घटना हुई, जिससे पूरी स्थिति बिगड़ चुकी थी। इस कारण कोलकाता लौटने की बजाय भगवती चरण वर्मा मुंबई के निवासी हो गए। भगवती चरण वर्मा ने प्रसार भारती को दिए एक इंटरव्यू में इसका जिक्र किया था।

हालांकि, मुंबई में रहने के लिए काम की जरूरत रही। वह एक जगह पहुंचे और काम शुरू किया, जिसमें सफलता भी मिली। इस बारे में भी भगवती चरण वर्मा ने इंटरव्यू में यह जानकारी दी थी।

कहा जाता है कि भगवती चरण वर्मा वही शख्सियत थे, जिन्होंने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया था। वर्मा की पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' थी, जिसकी उन्होंने पटकथा लिखी थी। उसी फिल्म में नायक की भूमिका में दिलीप कुमार थे।

उपन्यासकार के रूप में भगवती चरण वर्मा ने कई सशक्त और बहुचर्चित उपन्यासों की रचना की। इनमें पाप और पुण्य जैसे विषय पर 'चित्रलेखा' के साथ ही उन्हें 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते', 'आखिरी दांव', 'अपने खिलौने' और 'भूले-बिसरे चित्र' के रूप में 4 उपन्यासों के लिए हिंदी उपन्यास परंपरा में सम्मान से रखा जाता है।

'भूले-बिसरे चित्र' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया, जो भारतीय साहित्य का एक प्रमुख सम्मान है। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित भी किया था।