बिहार : सांस्कृतिक विरासत
- Post By Admin on Mar 13 2026
बिहार की सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल है। हमारी विरासत संतुलित, प्रगाढ़ एवं बहुआयामी है। आइए हम अपनी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं।
पारंपरिक वेश–भूषा
धोती, कुर्ती, बंडी, सिर पर एक साफा और कंधे पर गमछा – एक संपूर्ण किसान बाबू की पहचान होती है। महिलाओं की वेशभूषा साड़ी और ब्लाउज आदि है। साड़ी का एक छोर जिसे ‘आँचल’ महिलाएँ कंधे पर डालती हैं, वह नारी को देवी का रूप प्रदान करती है।
खान–पान
नाश्ते में दही–चूड़ा, दोपहर के भोजन में भात, अरहर मूंग मसूर की दाल, एक रसदार सब्जी, भुजिया जैसे आलू–गोभी, चोखा, चटनी, घी, अचार, पापड़ और दही। शाम में चूड़ा, रात में घी लगी रोटी–सब्जी और सोते वक्त एक गिलास गाय का दूध। रोटी गेहूँ की या मकई की या जो की हो सकती है। लिट्टी–चोखा का कहना ही क्या! दुनिया आज फास्ट–फूड की बात कर रही है, हमारे पूर्वज वर्षों से सत्तू और चूड़ा का प्रयोग फास्ट–फूड के तौर पर करते आए हैं। गौरव यह है कि हमारा सत्तू अब वैश्विक पहचान बना चुका है।
पूर्वज जानते थे कि ज्यादा मांसाहार स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं है, इसलिए मांसाहार सप्ताह में एक दिन और एक ही समय। हमारे देश के कई राज्यों में केवल चावल और कई राज्यों में सिर्फ रोटी ही प्रत्येक दिन खाया जाता है। हमारे भोजन की विविधता किसी अन्य देश या प्रदेश में नहीं पाई जाती। बंगाल के राज्य पश्चिम बंगाल में मांसाहार को प्रधानता है तो कहीं हमारे यहाँ चूड़ा–दही की प्रधानता है।
हमारे यहाँ दूध, दही, मिठाई और दूध के अन्य उत्पाद ज्यादा पसंद किए जाते हैं। हमारे यहाँ तो ‘छप्पन भोग’ की भी अवधारणा है। फलों में स्थानीय फल जैसे आम, लीची, कटहल, अमरूद एवं अन्य ऋतु फल हैं। केला बारहमासी सदाबहार फल है।
पर्व–त्योहार
मकर संक्रांति, वसंत पंचमी के साथ सरस्वती पूजा, होली, रामनवमी, महाशिवरात्रि, कृष्णजन्माष्टमी, तीज, छठ, दीपावली, ईद, बिहार के प्रमुख पर्व हैं। हमारे प्रत्येक त्योहार नई ऊर्जा और उमंग का संचार करते हैं। सरस्वती पूजा बच्चों की पूजा है। इसी पूजा से बच्चों में आस्था की नींव पड़ती है। इस दिन बच्चों में श्रद्धा, उत्साह एवं उमंग देखते ही बनता है।
बच्चे माँ सरस्वती के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और माँ उन्हें निराश नहीं करती हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना सिक्का जमा रहे हैं। इन पर्व त्योहारों पर पूरे बिहार का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। हमारे पर्व त्योहार सामाजिक एकता और सद्भाव बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करते हैं।
एक पूजा है जिसका नाम है – बथान पूजा या गोशा पूजा। इस पूजा के पहले समाज के सभी पशुपालकों के यहाँ सूचना दल भेजा जाता है। पूजा के दिन सभी पशुपालक जिनके यहाँ गाय भैंस दूध देती है, गाय भैंस दुहकर अपने घर में एक बूंद भी रखे बिना सारा दूध बाल्टी में भरकर बाल्टी पर अपना नाम लिखकर पूजा करने वाले के घर पहुँचा देते हैं।
पूजा उपरांत दूध वाली बाल्टी में प्रसाद रखकर पशुपालकों को वापस लौटा देते हैं। इसमें कोई जाति बंधन, बड़े छोटे, ऊँच–नीच का कोई भेद नहीं होता। यह है हमारे सांस्कृतिक विरासत की अनमोल कड़ी है। सामाजिक समरसता का बेमिसाल उदाहरण पूजा के वक्त करतब देखते बनता है। भक्त के साथ गायकों की एक टोली होती है। गायकों द्वारा सुरीली भाषा में ढोल, झांझ, मृदंग और झांझ पूरे वातावरण को संगीतमय और भक्तिमय बनाता है। पूजा करने वाले पूजा के भक्त और गायकों की टोली को नमन जिन्होंने इसे जीवंत रखा है।
ज्ञान की धरती
भगवान गौतम बुद्ध सारे संसार का भ्रमण किए लेकिन उन्हें ज्ञान बिहार की धरती पर ही प्राप्त हुआ। इस धरती पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, विद्यापति, रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने ज्ञान से विश्व को अभिभूत किया।
हमारे यहाँ प्रत्येक पुरुष और महिला ज्ञानी है। यहाँ पढ़ा–लिखा होना ही ज्ञान मापने का पैमाना नहीं होता। बस आप किसी के साथ अपनी समस्या साझा कीजिए, समाधान मिल जाएगा। स्वास्थ्य के मामले में हर कोई डॉक्टर है। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या किसी के सामने रखिए कोई न कोई नुस्खा अवश्य मिल जाएगा। लोग अपना ज्ञान बाँटने में थोड़ा भी संकोच नहीं करते हैं।
गीत संगीत
यहाँ हर कोई गाने और सुनने का शौकीन है। शारदा सिन्हा, उमरू सिंह, मैथिली ठाकुर जैसे ख्याति प्राप्त गायक हुए हैं। हम नाच के भी शौकीन हैं।
पारंपरिक कामगार
लोहार, कुम्हार, सोनार, मनिहार, बढ़ई, धोबी, हजाम हमारे सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख स्तम्भ हैं।
हमारी सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल है। आइए हम सभी इसे संजोएँ और अगली पीढ़ी को सौंपें। हम सभी बिहारवासियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व है।
लेखक – नित्यानन्द शर्मा (सेवानिवृत केंद्रीय सेवक)